|
उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
|
137 पाठक हैं |
हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
‘‘उसकी बात सुन मैं पुनः आपको, उस भयंकर परिणाम से बचने के उपाय बताने चला आया हूँ। मेरा कहना है कि देवकी और वसुदेव को छोड़ दीजिए। वसुदेव को अपनी पत्नी और पुत्र के साथ अपने देश को लौट जाने दीजिये। तत्पश्चात् कृष्ण को सुख और वासनामय जीवन व्यतीत करने का अवसर दीजिए। इससे आप पर आई आपत्ति का निवारण हो जाएगा।’’
‘‘कृष्ण के यहाँ से चले जाने के पश्चात् हम हस्तिनापुर वाले आपको वृन्दावन इत्यादि गाँव वापस दिलवा देंगे।’’
‘‘देखिये संजयजी! हाथ में एक पक्षी पेड़ पर दो से अधिक होता है। जो कार्य-विधि मैंने अपनाई हुई है, वह यह है कि अपने जीवन को नष्ट करने वालों को हाथ से निकलने न दूँ।’’
‘‘इसके अतिरिक्त कृष्ण अभी बालक है। मेरी राजधानी से पाँच कोस के अन्तर पर है। मैं उसकी गति-विधि को देख रहा हूँ। अतः जब भी उसने सींग निकालने आरम्भ किये, मैं उसको इस पृथ्वी पर से निकाल दूँगा। यदि मैंने उसके माता पिता को छोड़ दिया और वे इस बालक को लेकर मुझको सैकड़ो कोस दूर चले गए तो इस बालक पर मैं देख-रेख नहीं रख सकूँगा। यह वहाँ क्या बन जायेगा और क्या नहीं बनेगा, कौन कह सकता है? यह तो मैं जानता हूँ कि वह बड़ा होकर अधिक-से-अधिक एक योग्य ग्वाला बन जायेगा। मुझको उससे भय करने की आवश्यकता नहीं।’’
‘‘मैं हस्तिनापुर से एक आश्वासन चाहता हूँ कि यदि मैं अपने राज्य के गाँव वापस लाने के लिए युद्ध करूँ तो हस्तिनापुर को हमारे झगड़े में तटस्थ रहना चाहिए। उनको हम दोनों में से किसी का पक्ष नहीं लेना चाहिए।’’
मैंने देखा कि कंस युद्ध करने पर तुला हुआ है। वह अब युद्ध से रुक नहीं सकता। अतः मुझको इस युद्ध को रोकने का कुछ उपाय हस्तिनापुर की ओर से करना चाहिए। यह विचार कर मैंने कहा, ‘‘ठीक है। आप जो कुछ कह रहे हैं, वह सब महाराज धृतराष्ट्र से कह दूँगा।’’
|
|||||

i 









