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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
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मैं उसी दिन हस्तिनापुर के लिए चल पड़ा। मार्ग में एक सुनसान और किसी भी नगर से कोसों दूर, एक स्थान पर एक वृद्ध ब्राह्मण एक लाठी के सहारे धीरे-धीरे मानो बहुत थका हुआ हस्तिनापुर की ओर जाता हुआ दिखाई दिया।
रथ के समीप आने का शब्द सुन मार्ग के तट पर खड़ा हो वह रथ को रुकने का संकेत करने लगा। मैंने रथ रोकने का सारथि को आशा दी। वह ब्राह्मण मेरे पास आकर पूछने लगा, ‘‘पथिक किधर जा रहे हैं?’’
‘‘मैंने कहा, ‘‘हस्तिनापुर।’’
‘‘मुझको ले चलेंगे? मैं भी उस ओर ही जा रहा हूँ और बहुत थक गया हूँ। उचित भाड़ा दे दूँगा।’’
मैं मन-ही-मन उस ब्राह्मण के कहने पर हँसा। किन्तु ऊपर से गम्भीर भाव में ही मैंने कहा, कितना भाड़ा उचित समझते हो?’’
‘‘देखो आर्य! मैं एक निर्धन ब्राह्मण हूँ। दुखी हूँ, इस पर भी बिना परिश्रमिक दिये किसी से सेवा लेना अधर्म समझता हूँ। हस्तिनापुर यहाँ से साठ-सत्तर कोस अवश्य होगा। अतः मैं समझता हूँ कि हस्तिनापुर के लिए दो स्वर्ण-मुद्राएँ पर्याप्त होंगी। इस पर भी यदि आप कुछ और अधिक चाहेंगे तो विचारकर बताऊँगा।’’
मैंने कह दिया, ‘‘आ जाओ! दो स्वर्ण हैं तो कम, परन्तु तुम्हारी बात से, मैं समझ रहा हूँ कि तुम्हारे पास दो स्वर्ण के अतिरिक्त भी बहुत कम है।’’
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