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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
‘‘हाँ भगवन्! आपने ठीक समझा है। मेरे पास तीन स्वर्ण है। दो देने के पश्चात् केवल एक शेष बचेगा। यदि इसमें से कुछ और लेकर आप प्रसन्न हो जायें तो मुझको दुःख नहीं होगा।’’
इतना कह वह मेरे रथ पर सवार हो गया। मैंने सारथि को रथ हाँकने के लिए कह दिया।
कुछ देर वह चुपचाप बैठा रहा। फिर वह कहने लगा, ‘‘आपका रथ तो बहुत सुखमय है। इसमें हिचकोले बहुत कम लगते हैं।
‘‘जी!’’
‘‘कितने में लिया है, आपने?’’
‘‘यह मेरा नहीं है। मैंने भाडे पर लिया था?’’
‘‘कहाँ, से चले हैं आप?’’
‘‘मथुरा से।’’
‘‘क्या भाड़ा दे रहे हैं आप?’’
‘‘छोड़ो ब्राह्मण देवता! मैंने जो कुछ भी दिया हो, वह दो-तीन से तो बहुत अधिक है।’’
इस पर वह चुप हो गया। कुछ दूर तक चुपचाप चलते रहे। मैं अपने विचारों में लीन था। अतः मुझको उस ब्राह्मण के विषय में जानने की विशेष रुचि नहीं थी। मैं तो अपने विचार से उस निर्धन ब्राह्मण की समस्याओं से कहीं ऊँची समस्याओं पर विचार कर रहा था। मेरे मस्तिष्क में चन्द्रवंशियों के अस्तित्व की चिन्ता थी। भारत में घोर युद्ध की सम्भावना पर मेरा मन काँप रहा था। मुझको कंस द्वारा वृन्दावन तथा उसके पड़ोस के गाँवों के विनाश का विचार दुःखी कर रहा था। मैं भारत के पतन के विषय में विचार करता हुआ पुनः इसके राक्षसों अथवा दानवों के पाँव-तले रौंदे जाने की आशंका कर रहा था।
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