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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
मैं समझता था कि एक देश-व्यापी आन्दोलन उठाया जाय, जिसका उद्देश्य देश में शान्ति की भावना-उत्पन्न करता हो। मैं विचार कर रहा था कि यदि वह भावना प्रजा में एक व्यापक रूप धारण कर ले तो ये दुष्ट राजा शान्ति रखने, अर्थात् युद्ध न करने के लिए विवश हो जायेंगे। मैं इस प्रकार के आन्दोलन के विषय में योजनाओं को बनाने में लीन था इस समय मेरे साथी ने मेरी योजनाओं की ओर ध्यान न देते हुए कहा, श्रीमान्! आप किस कार्य से मथुरा पधारे थे?’’
‘‘ब्राह्मण देवता! क्या यह प्रश्न अनुचित नहीं?’’
‘‘हाँ, यदि आपका यह कार्य अपनी पत्नी से सम्बन्ध रखता हो तो पति-पत्नी के झगड़े में किसी बाहर के व्यक्ति का हस्तक्षेप उचित नहीं हो सकता।’’
मेरी हँसी निकल गई। मैंने पूछा, ‘‘क्या पति-पत्नी की बातों के अतिरिक्त अन्य कोई विषय नहीं, जो अपने मन में ही रखने योग्य हो?’’
‘‘हाँ, ऐसे विषय भी होते हैं। यदि आप किसी देश के राजाधिराज होते और किसी अन्य देश पर आक्रमण की तैयारी कर रहे होते तो बात को गुप्त रखने की आवश्यकता होती। परन्तु न तो आप राजा है न ही आप इस प्रकार अकेले भाग-दौड़ करने से किसी अन्य देश पर आक्रमण करने वाले प्रतीत होते हैं।’’
‘‘श्रीमान्, मैं आपको अपना परिचय दे दूँ तो कदाचित् आपका संकोच दूर हो जायेगा। तीन दिन की यात्रा चुपचाप बैठकर करनी तो कठिन प्रतीत होती है। विशेष रूप में जब अपने से आधे हाथ के अन्तर पर एक सज्जन बैठे हों।’’
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