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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
‘‘देखिये! मेरा नाम उग्रश्रवा है। मैं जंगल में उत्पन्न हुआ था। मेरीं माताजी अपने प्रसव के लिए ससुराल से मायके जा रही थी कि मार्ग में मेरा जन्म हो गया। वह जंगल दो महान् राज्यों की सीमा पर था। अतः मैं नहीं कह सकता कि मैं किस राज्य का नागरिक है।’’
‘‘मैं उज्जयिनी में शिक्षा प्राप्त करने के लिए भेज दिया गया। मैं जब वहाँ था तो मेरे माता-पिता का किसी अज्ञात रोग से देहान्त हो गया। वे अपनी किसी प्रकार की सम्मत्ति छोड़-नहीं गये थे। अतः शिक्षा काल समाप्त कर मैं अपनी शिक्षा के अनुकूल कार्य पाने के लिए इधर-उधर घूमने लगा। मेरा निर्वाह होता है किसी के बालक को शिक्षा देकर शुल्क लेने से। इस पर भी मैं भ्रमण करता रहता हूँ मैंने कहीं अपना घर नहीं बनाया। कुछ समय से मेरे मन में स्वर्गलोक में भ्रमण करने की इच्छा जागृत हो पड़ी है। इस कारण किसी बड़े नगर में चलकर कुछ धनोपार्जन कर स्वर्ग-लोक पहुँचने का यत्न करूँगा।’’
मैंने इस ब्राह्मण की अभिलाषा समझकर कहा, ‘‘स्वर्ग-लोक तक जाना सुगम नहीं। दो ही मार्ग है। वहाँ पहुँचने का एक मार्ग तो है इतनी तितिक्षा का जीवन की अति शीतावस्था में और बिना भोजन के रहने का स्वभाव हो। मार्ग में लगभग एक पक्ष-भर इतनी शीत मं रहना पड़ता है कि रक्त भी जमकर बर्फ हो जाने की सम्भावना होती है। प्रायः उधर जाने वाले मार्ग में ही बर्फ में जमकर देह से छूट जाते हैं।
‘‘एक दूसरा मार्ग भी है। वह है देवताओं को प्रसन्न करने का। उनके पास विमान हैं, जिस पर बैठाकर वे आपको स्वर्गलोक में ले जा सकते है, और यदि वहाँ का राजा प्रसन्न हो जाय तो वहाँ रहा भी जा सकता है।’’
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