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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
‘‘मैं देवलोक के मार्ग से ही जाना चाहता हूँ।’’
‘‘ठीक है, किन्तु यह तो तभी हो सकेगा, जब आप देवताओं के राजा इन्द्र को प्रसन्न कर लेंगे।’’
‘‘तो क्या उनको प्रसन्न करना अति कठिन है?’’
‘‘हाँ, और नहीं भी। इन्द्र की कुछ रुचि की बातें है, यदि वे आप कर सकें तो वे प्रसन्न किये जा सकते हैं।’’
‘‘क्या बातें हैं वे?’’
‘‘यदि आप किसी ललित-कला के ज्ञाता हैं तो निस्सन्देह उनको प्रसन्न करने के लिये अवसर मिल सकता है।’’
‘‘कैसी ललित-कला उनको सबसे अधिक प्रिय है?’’
‘‘नृत्य,, संगीत, चित्रकला इत्यादि।’’
‘‘मैं तो इनमें से कोई भी नहीं जानता। मैं दर्शन-शास्त्र का ज्ञाता हूँ। आत्मा-परमात्मा, प्रकृति सत्य-असत्य इत्यादि विषयों पर विशद विवेचना कर सकता हूँ।’’
‘‘इस प्रकार के ज्ञान की देवलोक में महिमा नहीं है। यह नहीं कि वे श्रुति-दर्शनादि में विश्वास नहीं रखते। बात यह है कि इन विषयों में वे स्वयं को हमसे अधिक ज्ञाता मानते हैं।’’
‘‘ओह! तो मुझको उनसे शास्त्रार्थ कर अपनी विद्वता का परिचय देना होगा?’’
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