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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
‘‘शास्त्रार्थ तो कर सकते हैं, किन्तु मध्यस्थ कौन बनेगा? जब वे किसी को अपने से अधिक योग्य मानते ही नहीं तो वे किसी को अपने और आपके बीच मध्यस्थ मानेंगे ही नहीं।’’
‘‘आपको उनके विषय में बहुत ज्ञान प्रतीत होता है।’’
‘‘हाँ, मैं दो बार देवलोक में जा चुका हूँ और प्रत्येक बार कई दिनों तब वहाँ रहा हूँ।’’
‘‘ओह! तब तो आप बहुत महानात्मा है।’’
‘‘नहीं श्रीमान्! मैं स्वयं को आप जैसा ही मानता हूँ। मुझको इन देवताओं का आपसे कुछ अधिक ज्ञान है, परन्तु इससे आत्मा की महानता का ज्ञान नहीं होता।’’
‘‘किन्तु आपने अभी तक नहीं बताया कि आप हैं कौन?’’
इस पर मैं विचार करने लगा कि कैसे अपना परिचय देने से बच सकता हूँ। मुझको एक बात सूझी। मैंने कहा, ‘‘जैसा आपने परिचय दिया है, वैसा मैं भी दे सकता हूँ। सुनिये, मैं अपनी माता का पुत्र हूँ। मेरा जन्म एक फूँस की बनी कुटिया में हुआ था। यह सब मेरी माँ ने मुझे बताया था। मेरा कार्य है श्रीमानों के दर्शन करना और इसी सम्बन्ध में मैं देवलोक भी गया था।’’
मेरा परिचय सुन वह ब्राह्मण खिलखिलाकर हँस पड़ा। उसने कहा, ‘‘एक बात तो मैं आपके विषय में जान गया हूँ। वह यह कि आप मुझसे अधिक चतुर हैं।’’
‘‘जी नहीं, मैं बहुत ही साधारण व्यक्ति हूँ। जो कुछ चतुराई आपने मुझमें देखी है वह वास्तव में आपका मेरे मन-मुकुर पर प्रतिबिम्ब मात्र है।’’
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