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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
इस पर वह फिर हँस पड़ा। मैं सामने की ओर, जिघर रथ जा रहा था, देखता रहा। वह हँसकर कहने लगा, ‘‘आपको मेरे कथन का विश्वास नहीं आया कि मैं इतना साधारण व्यक्ति हूँ कि उसका नाम-धाम जानना उतना ही व्यर्थ है, जितना सागर में एक बूँद जल का परिचय प्राप्त करना।’’
इसमें उत्तर देने के लिए कुछ था नहीं। मैं चुप रहा। फिर उसी बात को चलाते हुए उसने कहा, ‘‘आप इतने दिनों देवलोक में रहकर क्या करते रहे थे?’’
‘‘मुझसे मेरी कला का प्रदर्शन कराया गया था’’
‘‘ओह! तो आप कलाकार भी है?’’
‘‘यों ही कुछ-कुछ चित्र बनाना जानता हूँ?’’
‘‘तो आप वहाँ चित्र बनाते रहे हैं?’’
‘‘हाँ।’’
‘‘देवेन्द्र का चित्र भी बनाया था आपने?’’
‘‘नहीं? उसे बनाने के लिए कहा ही नहीं गया।’’
‘‘तो फिर किसका चित्र बनाने के लिए कहा गया था?’’
‘‘देवेन्द्र की दो परमप्रिय अप्सराओं का चित्र बनाया था। उनमें एक का नाम था मेनका और दूसरी का उर्मिला।’’
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