|
उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
|
137 पाठक हैं |
हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
‘‘आपके पास हैं वे चित्र?’’
‘‘मुझे वे चित्र अपने साथ लाने की स्वीकृति नहीं दी गई। वास्तव में मैं लाना भी नहीं चाहता था, क्योंकि वे दोनों चित्र उनके नग्न शरीर के हैं और मुझे विश्वास है कि यदि उन चित्रों को मानव-लोक में कोई देख ले तो उनके लिए पागल हुए बिना नहीं रह सकता। यहाँ की स्त्रियों का सौन्दर्य तो उनसे बहुत ही घटिया है।’’
‘‘परन्तु आपने तो प्रहरों ही उनके सम्मुख बैठकर चित्र बनाया होगा। किन्तु आप पागल हो गये होंगे, ऐसा प्रतीत नहीं होता।’’
‘‘एक बार तो मैं स्वयं पर नियंत्रण रख सका था। यह नियंत्रण घोर तपस्या से ही सम्भव हो सका था। परन्तु दूसरी बार उर्मिला का सौन्दर्य मेनका के सौन्दर्य से अधिक प्रबल सिद्ध हुआ था।’’
‘‘आप बहुत ही भाग्यशाली हैं।’’
‘‘इसमें भाग्य की तो कोई बात नहीं है। आवेग में कुछ हो गया, जिसके लिए मुझे प्रसन्नता नहीं है।’’
‘‘इतने मनमोहक स्थान को आप छोड़ आये? वहाँ से निकाल तो नहीं दिये गए?’’
‘‘जी नहीं! जहाँ तक मैं समझता हूँ, मेरे चित्र इतने अच्छे बने थे कि देवलोक की प्रायः सभी स्त्रियाँ अपने उसी प्रकार के चित्र बनवाने के लिए उत्सुक थीं। यदि मैं चाहता तो जीवन-भर नग्न स्त्रियों के चित्र बनाता रहता और तब भी कार्य समाप्त नहीं होता।’’
‘‘देवेन्द्र की अप्सरा से आपके सम्बन्ध पर उनको रोष तो हुआ होगा।’’
‘‘उनके मन में क्या रहा होगा, यह मैं नहीं जानता! प्रकट में तो वे मुझको वहाँ ही रह जाने का आग्रह कर रहे थे।’’
|
|||||

i 









