|
उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
|
137 पाठक हैं |
हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
‘‘और आपने स्वीकार नहीं किया वहाँ रहना?’’
‘‘जी नहीं।’’
‘‘क्यों? वहाँ क्या कष्ट था आपको?’’
‘‘वह जीवन सर्वथा नीरस था। वहाँ के रहने वाले निरुद्देश्य जीवन व्यतीत करते थे। परिणाम अति भयंकर हो रहा था। किसी को कुछ भी काम नहीं था, सब ऐसे हो रहे प्रतीत होते थे मानो उनको जंग लग रहा हो–उनके शरीरों को, उनके मनों को और कदाचित् उनकी आत्माओं की भी। संसार के नियमानुसार यह समस्त जाति विनाशोन्मुख प्रतीत होती थी।’’
वह ब्राह्मण हँस पड़ा। इस बार उसकी हँसी व्यंग्यपूर्ण प्रतीत होती थी। हँसी की एक प्रकार की ध्वनि सुन मैंने घूमकर उसके मुख की ओर देखा तो मुझको उसकी आँखों में शरारत दिखाई दी, जो पहले नहीं थी। मैंने पूछा, ‘‘क्यों महाराज, मैं कोई अनहोनी बात कह रहा हूँ क्या?’’
मेरे इस प्रश्न से सतर्क हो वह कहने लगा, ‘‘जो कुछ देवताओं के विषय में मैंने सुन रखा है, उससे तो ऐसी कोई सम्भावना प्रतीत नहीं होती। देखिये श्रीमान्! मुझको एक अन्य व्यक्ति ने, जो प्रायः वहाँ आता-जाता रहता है, बताया है कि प्रत्येक प्राणी जो उस देश में जन्म लेता है, उसके खाने-पहनने और निवास का अच्छे-से-अच्छा सम्भव प्रबन्ध राज्य की ओर से होता है। जब वहाँ जनसंख्या बढ़ने लगती है तो बच्चों की उत्पत्ति बन्द कर दी जाती है। जब स्त्री और पुरुषों की संख्या आवश्यकता से न्यूनाधिक होने लगती है तो लड़के तथा लड़कियाँ अधिक अथवा कम कर दिये जाते हैं। वहाँ खेल-कूद और मनोरंजन की इतनी अधिक सामग्री है कि किसी का मन ऊबता ही नहीं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि बहुत सीमा तक वहाँ के लोगों ने जन्म और मरण पर अधिकार पा लिया है!’’
|
|||||

i 









