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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


‘‘देखिये भगवन्! जिस देश में जनसंख्या नियन्त्रित हो जाय, वहाँ आन्तरिक झगड़े नहीं होते। जहाँ प्रकृति की शक्तियों पर इस प्रकार अधिकार प्राप्त हो जाये कि उसका प्रयोग शत्रुओं के आक्रमण को रोकने के लिए किया जा सके, वहाँ बाहर से कोई विपत्ति नहीं आ सकती। ऐसी अवस्था में उस देश का और उस देश की बसी हुई जाति का नाश क्यों होगा?’’

‘‘इसलिए कि मनुष्य-जीवन एक संघर्ष है। यदि इसको संघर्ष-रहित कर देंगे तो जीवन ही नहीं रहेगा। बुद्धिमान नेता का कार्य यह है कि वह जीवन को संघर्ष-रहित तो न करे, परन्तु संघर्ष की दिशा ऐसी कर दे कि जिससे व्यक्ति और समाज उत्तरोत्तर उन्नति करते चले जायें।’’

‘‘देवेन्द्र ने देवलोक की प्रजा के जीवन से संघर्ष को समाप्त प्राय कर दिया है। इस पर भी देवता लोग संघर्ष कर रहे हैं। वहाँ बात यह हो रही है कि व्यक्तिगत संघर्ष इन्द्रियों के सुख के निमित्त होता है। यह पूर्ण जाति को ही एक दिन अपंगु बना देगा।’’

‘‘एक समय था कि देवताओं के असुरों से युद्ध होते थे। उन युद्धों के कारण देवता अपने-आपको अधिकाधिक सुदृढ़ करने में लगे रहते थे। वह समय था जब देवताओं में एक-से-एक योग्य व्यक्ति उत्पन्न होता था। अब असुर और दानव ह्नास को प्राप्त हो चुके हैं। अतः देवता अपने लिए कुछ अन्य कार्य न ढूँढ़ सकने के कारण वासना में लिप्त हो रहे हैं। यह विनाश का मार्ग तो है ही।’’

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