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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
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इस प्रकार मेरी हस्तिनापुर की यात्रा इस ब्राह्मण देवता से अनेकानेक देशों के रहने वालों के विषय पर वार्त्तालाप में कट गई। जब मैं हस्तिनापुर राजप्रासाद में पहुँचा तो मैंने रथ से उतरकर अपनी यात्रा के साथी ब्राह्मण से पूछा, ‘‘भगवन्! अब कहाँ जाइयेगा?’’
‘‘मेरा हस्तिनापुर में कोई विशेष परिचित व्यक्ति तो है नहीं। यदि आप निमन्त्रण दें तो उचित निवासस्थान ढूँढ़ने तक आपका अतिथि बन जाऊँगा।’’
मैं इस प्रकार की माँग से भौंचक्क हो अपने साथी का मुख देखता रह गया। मुझको चुप देख मुस्कराते हुए उसने कहा, ‘‘तीन दिन तक आपकी संगत में रहते हुए मुझको बहुत ही लाभ और प्रसन्नता हुई है। यदि नंगत और अधिक काल तक चल जाये तो और भी लाभ होगा। हाँ, एक बात तो मैं भूल ही गया हूँ। आपकी दो स्वर्ण-मुद्राएँ रथ का भाड़ा देना है और साथ ही अपना परिचय भी।’’
‘‘भाड़े की तो आवश्यकता नहीं। मैं समझता हूँ कि आपके साथ मैं अपना सेवक भेज रहा हूँ, जो आपको पंथागार तक पहुँचा देगा।’’
वह खिलखिलाकर हँसा और बोला, ‘‘संजयजी! मैं पंथागार में नहीं रहना चाहता। आप भीतर चलिए, मैं आपको वहाँ चलकर अपना परिचय दूँगा। मेरा परिचय जान लेने के पश्चात् आपके द्वारा मुझे आमन्त्रित करने का संकोच दूर हो जायेगा।’’
मैंने बहुत ध्यानपूर्वक अपने साथी के मुख की तरफ देखा। मैं उसको अभी भी पहचान नहीं सका कि यह कौन व्यक्ति है जो समझता है कि मैं उसको जानता हूँ अथवा उसको पहचानकर प्रसन्न होऊँगा। मैं यत्न करने पर भी जब समझ नहीं सका कि वह कौन है, तो वह बोला, ‘‘आइये, भीतर आ जाइये।’’
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