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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
‘‘संजयजी! यह तो हो जायेगा। यदि कोई योग्य व्यक्ति नहीं मिलेगा तो मैं स्वयं अस्त्र-शस्त्र धारण कर रण-भूमि में चलूँगा। आप क्या समझते हैं कि मैं वृद्ध हो गया हूँ?’’
मैं चुप रहा! वहाँ से छुट्टी मिली तो मैं अपने-निवास-गृह की ओर चला आया। मैं गृह की बैठक में प्रविष्ट हुआ तो सामने देवेन्द्र को बैठा देख चकित रह गया। मैंने झुककर प्रणाम किया तो उन्होंने मुझको अपने समीप बैठने का संकेत कर दिया। मैंने पूछा, ‘‘श्रीमान्! कब और किस प्रयोजन से पधारे हैं?’’
‘‘अपने हस्तिनापुर आने का प्रयोजन तो पीछे बताऊँगा। सर्वप्रथम मैं यह चाहता हूँ कि मेरा यहाँ आना किसी को विदित न हो सके। मैं गुप्त रहना चाहता हूँ। ठीक है न?’’
‘‘जैसी आपकी इच्छा। परन्तु मेरा एक निवेदन है। यदि आपको हस्तिनापुर राज्य के विरुद्ध कोई कार्य करना है तो अपना निवास-गृह कहीं अन्यत्र बनाना होगा।’’
‘‘देखिए संजयजी! मैं सत्य कहता हूँ कि मैं अथवा हम देवतागण किसी का भी विरोध नहीं करते। लोग अपनी विपत्ति का निर्माण स्वयं करते हैं। हाँ, मैं कुछ ऐसा यत्न कर रहा हूँ कि जो विपत्ति इस देश पर आ रही है, उससे भले लोग बच जायें जिसमें कि संसार से भलाई का लोप न हो।’’
‘‘इस पर भी यह बात तो हम तब विचार करेंगे, जब मैं अपना यहाँ आने का अपना प्रयोजन बताऊँगा। उससे पूर्व भोजनादि के लिए आमन्त्रित नहीं करेंगे क्या?’’
यहाँ एक अन्य अतिथि घर पर पधारे हैं, वे सम्भवतया अभी तक सन्ध्योपासना से निवृत्त नहीं हुए। वे आ जायें तो फिर भोजनालय में चलिए। परन्तु एक साधारण व्यक्ति के घर का निरामिष भोजन ही तो यहाँ पर मिल सकेगा।’’
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