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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


सुरराज हँसकर कहने लगा, ‘‘मैं समझता हूँ कि आपका दूसरा अतिथि तो भाग गया है।’’

‘‘मुझको यहाँ देख मुझसे भयभीत होकर यहाँ से चुपचाप निकल गया है।’’

इस सूचना से मैं परेशानी अनुभव करने लगा। मुझे भय लगने लग गया था कि वह कहीं कुछ चुराकर न ले गया हो। मैंने सेवक को पुकारा। वह आया तो मैंने पूछा, ‘‘विवेक! वह ब्राह्यण किधर चला गया है?’’

विवेक कुछ परेशान प्रतीत होता था। उसकी घबराई सूरत देख मुझको विश्वास हो गया कि वह अवश्य कुछ उठाकर ले गया है। विवेक ने साहस पकड़कर कहा, ‘‘आर्य! मैं स्नानागार से बाहर ही बैठा था, स्नानागार में वह ब्राह्मण गया था, किन्तु निकले वहाँ से ये श्रीमान्! ये सब वस्त्र और सुन्दर भूषण कहाँ से आ गये, मैं नहीं जानता। वह ब्राह्मण तथा उसके मैले-कूचैले वस्त्र भी किधर गये, यह भी मुझे पता नहीं। स्नानागार से बाहर जाने का तो कोई अन्य मार्ग नहीं है।’’

मैं समझ गया। वह ब्राह्मण और ये इन्द्र एक ही व्यक्ति हैं। इस पर भी मैंने पूछा, ‘‘स्नानागार में से कोई वस्तु गुम तो नहीं हो गई?’’

‘‘नहीं आर्य!’’

‘‘अच्छा जाओ, भोजन परोस दो।’’

जब विवेक बाहर चला गया तो हम दोनों खिलखिलाकर हँस पड़े। हँसकर मैंने कहा, ‘‘श्रीमान् ने उस रथ में यात्रा क्यों की? आप तो अपने किसी विमान में एक घड़ी-भर में यहाँ पहुँच सकते थे।’’

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