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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


‘‘मैं यहाँ अज्ञातवास कर रहा हूँ। इसके अतिरिक्त वायुयान में आपके देवताओं और देवलोक के विषय में धारणा सुनने का अवसर किस प्रकार मिलता?’’

‘‘वह तो आप आज्ञा करते तो मैं वहीं देवलोक में आकर निवेदन कर देता।’’

‘‘अब हम आपको देवलोक नहीं आने देंगे। आपसे उर्मिला प्रसन्न नहीं है और हम उर्मिला से प्रसन्न नहीं हैं।’’

‘‘वह मुझसे प्रसन्न क्यों नहीं? और आप उससे रुष्ट क्यों है?’’

‘‘आपसे वह मानवों की भाँति प्रेम करने लगी है। अतएव वियोग और विरह से पीड़ित है। इसके अतिरिक्त आप उसकी लड़की को ले आए हैं। अर्थात उसकी लड़की के लिए ममता उसको आपके विरुद्ध कर रही है।’’

‘‘दूसरी ओर देवलोक की स्त्रियों का यह चलन नहीं। वे स्त्री पुरुष के सम्बन्ध को ऐसा नहीं मानतीं, जैसा कि मानव-समाज में माना जाता है। यौन-क्रिया तो हममें ऐसी ही मानी जाती है, जैसे किसी मधुर पेय को लेना अथवा स्वादिष्ट पदार्थ का सेवन। इस कारण हम उर्मिला के चलन को ठीक नहीं मानते और हम उससे प्रसन्न नहीं है।’’

‘‘तो महाराज! एक बात की जा सकती है। उसको यहाँ हस्तिनापुर में भेज दिया जाये। वह वहाँ मेरी पत्नी बनकर रह सकती है। मैं उसकी लड़की को उसके पास बुलवा दूँगा और इससे उसकी दोनों अभिलाषाएँ पूर्ण हो जाएँगी।’’

‘‘यह प्रस्ताव तो आपने पहले भी उसके सम्मुख रखा था। यदि आप कहें तो उसके सम्मुख पुनः रख दूँ।’’

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