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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
देवेन्द्र मेरे घर पर लगभग एक पक्ष तक रहे। देवेन्द्र में एक विशेष प्रकार का आकर्षण था, जो न्यूनाधिक सब देवताओं में रहता है। एक भव्य और आकर्षक युवक का मेरा अतिथि होना किसी से छिपा न रह सका। यह बात गान्धारी, शकुनि और भीष्म के कानों तक भी पहुँची और सबने पृथक्-पृथक् मुझसे उसके विषय में पूछा। मैंने टाल-मटोल में उत्तर दिया जिसका परिणाम यह हुआ कि एक दिन भीष्मजी बिना सूचना के मेरे घर पर आ गये। मैं उस समय देवेन्द्र के साथ भोजन कर रहा था।
इस पर मैंने देवेन्द्र को ही अपना परिचय देने के लिए कह दिया। देवेन्द्र ने कहा, ‘‘मैं देवलोक का रहने वाला हूँ। आज संसार-भर में हस्तिनापुर की धूम है, अतः मेरे मन में इस नगर की विशेषताएँ देखने की इच्छा उत्पन्न हो गई। मैं देवेन्द्र की स्वीकृति से यहाँ आया हूँ। उन्होंने मुझ को संजयजी के नाम परिचय-पत्र भी दिया है। इन्होंने मुझको प्रायः सब मुख्य-मुख्य दर्शनीय स्थान दिखा दिए हैं और यहाँ के नागरिकों के रहन-सहन के विषय में सूचना दी है।’’
भीष्मजी का प्रश्न था, ‘‘आप वहाँ क्या करते हैं?’’
‘‘हमारे यहाँ किसी के भी करने का कुछ काम नहीं है। देवलोक में लगभग पाँच सौ बन्दी ही काम करते हैं और उनके कार्य का फल इतना होता है कि लगभग दस लक्ष प्रजा का पालन-पोषण भली-भाँति हो जाता है।’’
‘‘बहुत विचित्र है! तो क्या लोग खाली बैठे-बैठे उकता नहीं जाते?’’ भीष्मजी ने आश्चर्य प्रकट करते हुए पूछा।
‘‘जी नहीं, हम जीविकोपार्जन के लिए कुछ न करते हुए भी दिनभर कार्य में लगे रहते हैं। हम खेल कूद करते हैं नाचते हैं, गाते हैं चित्रकला तथा अन्य कलाओं में दिन-भर लगे रहते हैं।’’
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