|
उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
|
137 पाठक हैं |
हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
‘‘आपने यहाँ क्या देखा है? हमारे यहाँ तो बिना कार्य किये जीवन चल नहीं सकता। लोग दिन-भर कार्य करते हैं। सायंकाल मनोरंजन करते हैं, रात को आन्नद से विश्राम करते हैं।’’
‘‘हम उसका अर्थ यह समझते हैं कि आपमें से प्रायः लोग आठ में से सात प्रहर तो नरक-भोग करते हैं और एक प्रहर ही सुख का अनुभव प्राप्त कर सकते हैं।’’
‘‘हम समझते हैं कि दिन के परिश्रम के पश्चात् वह एक प्रहर आपके अनायास मिले दिन-भर के मनोरंजन से अधिक सुखप्रद होता है।’’
इन्द्र इस बात पर हँस पड़ा। इन्द्र के हँसने का चाँद की-सी घण्टियों का शब्द सुनकर और मुक्ता की-सी लड़ियों के दाँत देखकर भीष्मजी मन्त्रमुग्ध बैठे रहे।
इन्द्र ने बात बदल दी। उसने कहा, ‘‘हमारे यहाँ यह विख्यात है कि इस राज्य में यदि कोई व्यक्ति है तो वह आप है। अतः आपसे मेरा निवेदन है कि महान् वह है, जो महान् सन्तान को जन्म दे। जब तक महानता बीजगत न हो जाये, तब तक वह बाहरी और अस्थायी रहती है। आपने अपनी महानता और योग्यता अपने पुत्र और पौत्रों तक नहीं पहुँचाई। इस कारण आपकी महानता परीक्षा के समय टिकी भी रहेगी अथवा नहीं, कहना कठिन है।’’
‘‘तो क्या आप समझते हैं कि धृतराष्ट्र और पांडु महान् सन्तान नहीं है। क्या उनको धर्म का उचित ज्ञान नहीं है? क्या चरित्र में वे किसी प्रकार से शिथिल है? आप कैसे कहते हैं कि वे महान् नहीं है।’’
‘‘देखिये महाराज! मैं तो एक साधारण व्यक्ति हूँ, इस पर भी मैंने संसार-भर में भ्रमण किया है। धृतराष्ट्र में एक दुर्बलता है जिस कारण वे इतने बड़े राज्य के सम्राट् होने के योग्य नहीं हैं। वे गान्धारी के आग्रह को टाल नहीं सकते और गान्धारी अपने भाई का आग्रह मानती है। इस प्रकार राज्य की नीति एक अनुभवहीन शिक्षा तथा प्रकृति के निम्नकोटि वालो व्यक्ति के हाथ चली गई है।’’
|
|||||

i 









