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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
‘‘पांडु को राज्य कार्य में रुचि नहीं रही। परिणाम यह है कि जो कुछ राज्य-कार्य की शिक्षा उसको मिली थी वह व्यर्थ गई है। अब दुर्योधन आदि की बात भी सुन लीजिए। वह अपने मामा शकुनि की राय से कार्य कर रहा है। आजकल मथुरा के कंस का एक मित्र शिशुपाल, जो कि शकुनि का भी मित्र है, यहाँ आया हुआ है वे दोनों ही दुर्योधन इत्यादि के चरित्र का निर्माण कर रहे हैं।’’
‘‘अपने दुर्योधन आदि भाइयों को गुरु आचार्य द्रोण को नियुक्त कर दिया है। आचार्यजी अत्यन्त योग्य होते हुए भी निर्धनता का स्वाद ले चुके हैं। अतः वे पुनः इस निर्धनता में फँस जाने के भय से कभी भी शकुनि और शिशुपाल का विरोध नहीं करते। वे जानते हैं कि इस राज्य में उनकी चलती है। शेष तो उन दोनों के हाथ में खिलौने मात्र हैं।’’
‘‘बताइए, जहाँ एक ऐसी स्त्री की चले जो जान-बूझकर अपनी आँखों पर पट्टी बाँधे हुए हो और आँखों पर पट्टी बाँधे हुए हो और जहाँ राज्य की नीति चलाने वाले अल्प-शिक्षित, ढीले चरित्र के नवयुवक हों, जहाँ आप-सदृश वृद्धजनों की शिक्षा की अवहेलना करना स्वभाव बन गया हो और अन्त में, जहाँ आप-सदृश वृद्ध-जन बच्चों की उच्छृंखलता देख हँस देते हों, वहाँ के राज्य, राष्ट्र और धर्म ही भगवान ही रक्षा कर सकता है।’’
भीष्म ने हँसते हुए पूछा, ‘‘तो आप हमें क्या करने की राय देते हैं?’’
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