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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


‘‘मैं कौन हूँ आपको शिक्षा देने वाला? आप अत्यन्त विद्वान और अनुभवशील व्यक्ति है। मैं तो संजयजी के कथानुसार, प्रमादयुक्त निकम्मे तथा निखट्टू देवताओं का सजातीय हूँ। इस पर भी यदि हमारे महाराज, मेरा अभिप्राय है देवेन्द्र, आपके स्थान पर होते तो शिशुपाल और शकुनि को हस्तिनापुर से सौ-सौ कोस दूर रहने की आज्ञा देते। वे गान्धारी को आज्ञा देते कि वह आँखों की पट्टी खोल दे जिससे भावी सम्राट् की माता तो देख पाती कि क्या हो रहा है और उसके तथा उसके पति के लिए कौन-सा मार्ग कल्याणकारी है। वे दुर्योधन इत्यादि को किसी ऋषि के आश्रम में वेद-शास्त्र के अध्ययन के लिए भेज देते और पांडु के पुत्रों को बुलाकर गुरु द्रोणाचार्य की शिक्षा में रखकर योग्यता प्राप्त करने का अवसर देते। साथ ही आचार्यजी के नाम कुछ गाँव लिख देते, जिससे कभी राजकुमारों से झगड़ा हो जाने पर उसको विश्वास रहता कि वे सत्य पर डटे रहने से भूखे नहीं मर जायेंगे।’’

इस सुझाव को सुन विस्मयलीन हो भीष्मजी वहाँ से चल दिये। उनके चले जाने के पश्चात् इन्द्र ने मुझसे कहा, ‘‘संजयजी! मेरा यहाँ कार्य समाप्त हो गया है। मैंने जो कुछ कुरु-वंशियों को कहना था, कह दिया है। मुझको विश्वास है कि वे मानेंगे नहीं। यह इस कारण नहीं कि भीष्मजी इस मार्ग की श्रेष्ठता को मानते नहीं। प्रत्युक्त इस कारण कि ब्रह्मचारी रहते हुए भी, धर्म-कर्म का ज्ञान रखते हुए भी और जीनव-भर निःस्वार्थ कार्य करने वाले होते हुए भी वे मन के दुर्बल हैं और इससे अपने सम्बन्धियों की उच्छृंखलताओं को रोक नहीं सकते।

‘‘यदि इन्होंने स्वयं को ठीक मार्ग पर आरूढ़ न किया तो जो होना है, उसका प्रबन्ध संसार की श्रेष्ठ शक्तियाँ कर रही है।’’

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