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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
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मैं जब से मथुरा लौटा था, भीष्म और धृतराष्ट्र को कह रहा था कि मथुरा में देवकी और वसुदेव को बन्दी-गृहा से मुक्त कराने का यत्न किया जाए। भीष्म तो इस विषय में कह देते थे कि मैं धृतराष्ट्र से बात कर योजना बनाकर कार्याविन्त करूँगा। परन्तु धृतराष्ट इस विषय में किसी निर्णय पर पहुँच नहीं पाते थे। अतः बात टालते जा रहे थे। देवेन्द्र के हस्तिनापूर जाने के लगभग एक माह पश्चात् धृतराष्ट्र ने मुझको एक परिवारिक गोष्ठी में आमंत्रित किया। उसमें जहाँ भीष्म और सत्यवती उपस्थित थे, वहाँ धृतराष्ट्र, गान्धारी और शकुनि तथा शिशुपाल भी उपस्थित थे।
भीष्मजी ने शिशुपाल का परिचय देते हुए कहा, ये कंस के मित्रों में से हैं और मथुरा के विषय में बहुत-कुछ ज्ञान रखते हैं। इसी कारण मथुरा के विषय में किसी निर्णय पर पहुँचने के लिए इनकी सम्मति बहुत महत्व की होगी।’’
तत्पश्चात् मैंने वहाँ की पूर्ण परिस्थिति और कंस से हुए वार्त्तालाप को दोहरा दिया। जब मुझसे वहाँ की समस्या का सुझाव पूछा गया तो मैंने बता दिया कि यदि देवकी और वसुदेव को मुक्त कर उनको अपने राज्य में चले जाने की स्वीकृति दे दी जाय तो वे अपने लड़के को भी साथ ही लेते जायेंगे। वह लड़का गुर्जर देश में चला जाने से कंस से द्वेष करना भूल सकता है। वसुदेव के बंदी बनाये जाने पर भी गुर्जर देश के निवासियों ने उनको छुड़ाने का यत्न नहीं किया। अतः वसुदेव छूटकर अपने राज्य में चला जायेगा तो वहाँ लोग प्रसन्न और सन्तुष्ट हो जायेंगे और झगड़ा करने की सम्भावना पहले से कम होगी। तत्पश्चात् हम बृहत्बल और कंस में संधि करा मथुरा राज्य के गाँव मथुरा वालों को वापस दिलवा सकते हैं।’’
मेरी योजना सुन मुझसे प्रश्न पूछे जाने लगे। नंद कौन? कृष्ण कैसा दिखाई देता है? क्या वह देवकी का पुत्र प्रतीत होता है?
बृहत्बल की क्या सम्मति है? इत्यादि। मैंने जानकारी के अनुसार उन प्रश्नों का उत्तर दिया। तत्पश्चात् शकुनि के कहने पर कि उन्होंने सब बात समझ ली है और अब एक-दो दिन में अपना निर्णय दे देंगे। सब उठकर खड़े हुए और मैं वहाँ से चला आया।
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