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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


इस गोष्ठी का परिणाम यह हुआ कि धृतराष्ट्र की आज्ञा लेकर एक दूत हस्तिनापुर से मथुरा चला आया। मुझे इस बात का ज्ञान नहीं था। वह तो अकस्मात् भीष्मजी के मुख से निकल गया, ‘‘हमने हस्तिनापुर का निर्णय कंस को भेज दिया है।’’

‘‘क्या संदेश भेजा है महाराज!’’

‘‘यही कि हम किसी राज्य के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करना नहीं चाहते। वह अपनी बहन और बहनोई से कैसा व्यवहार करता है यह हमारे जानने की बात नहीं। उसको किसी को भी मृत्यु-दण्ड देने का अधिकार है अतएव उसको अपनी बहन की सन्तान को मरवा डालना हमको आपत्तिजनक नहीं हो सकता। हाँ, वह यदि किसी पड़ोसी-राज्य पर आक्रमण करेगा अथवा उसको पड़ोसी-राज्य उस पर आक्रमण करेगा तो हम हस्तक्षेप करेंगे। हम भारत में अशान्ति नहीं फैलने देंगे।’’

मैं इस व्यवस्था को सुन निराश हुआ। मैंने कहा, ‘‘महाराज! आपने तो कंस की प्रार्थना का उत्तर ही नहीं दिया। उसका कहना था कि उसके गाँव दूसरे राज्य ने अपने अधिकार में कर लिए है।’’

‘‘हमने इस विषय में कुछ लिखा तो नहीं है, परन्तु हमारे लिखने का अर्थ यही है कि हम प्रजा का अधिकार मानते हैं कि वह जिस भी राज्य में रहना चाहे, रह सकती है’ यदि उन गाँवो पर अधिकार बृहत्बिल ने बल पूर्वक किया होता तो हम इसको भरत-राज्य का मथुरा पर आक्रमण समझते। परन्तु ऐसा नहीं हुआ।’’

मैं इस पर कुछ नहीं बोला। वास्तव में राजप्रासाद में अब मेरे अतिरिक्त अन्य परामर्शदाता आ गये थे। शकुरि और शिशुपाल की अधिक चलने लगी थी। इस कारण मैंने इन्द्र के कथन को स्मरण कर कि संसार को श्रेष्ठ शक्तियाँ देश को बचाने का प्रबन्ध कर रही हैं, अपने कार्य में लीन हो गया।

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