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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
इन्द्र को हस्तिनापुर से गये एक वर्ष भी नहीं बीता था कि एक दिन उर्मिला ने आकर मेरा द्वार खटखटाया। मैं मध्याह्न के भोजनापरान्त विश्राम कर रहा था। सेवक ने आकर बताया कि कोई सुन्दर स्त्री मेरे विषय में पूछ रही है।
मैं समझ गया कि उर्मिला हो सकती है। अतः उठकर द्वार पर पहुँचा तो उसको द्वार पर एक नवजात शिशु को गोद में लिए देख विस्मित-सा उसे निहारता रहा। उर्मिला ने कहा, ‘‘क्या मुझे पहचाना नहीं?’’
‘‘तुमको तो पहचान लिया है। किन्तु यह बोझा किसका ढो रही हो? मैं यही विचार कर रहा था।’’
‘‘ईश्वर को धन्यवाद है कि आपने मुझे पहचाना तो। मैं आपके पास रहने के लिए आयी हूँ।’’
‘‘किस रूप में?’’
‘‘एक सुन्दर स्त्री एक पुरुष के पास किस रूप में आ सकती है?’’
‘‘भगिनी, पुत्री, पत्नी और माता के रूप में भी।’’
‘‘नहीं ऐसे नहीं। एक दासी के रूप में। सुना है कि आपकी सेवा में आजकल कोई दासी नहीं है। आप-सदृश श्रीमानों की सेवा में कोई न कोई दासी होनी चाहिए। ठीक है न?’’
‘‘हाँ! है तो ठीक, परन्तु आजकल हस्तिनापुर में दास-दायिसों चोरी अधिक करने लगी है, इससे मन डरता है।’’
‘‘डरने की बात नहीं। मैं शपथपूर्वक कहती हूँ कि चोरी नहीं करूँगी।’’
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