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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
मैं उसको भीतर आने का संकेत कर बैठक में ले गया और पूछने लगा, ‘‘क्या मैं जान सकता हूँ कि देवीजी को देव-समाज के प्रति धारणा का क्या हुआ, जो एक क्षद्र-मानव की सेवा करने के लिए सैकड़ों कोस की यात्रा का कष्ट उठाया है?’’
‘‘कष्ट कुछ भी नहीं हुआ। सुरराज की आज्ञा से मैं देवलोक से निर्वासित कर दी गई हूँ। मुझे विमान पर बैठाकर हस्तिनापुर से बाहर उतार दिया गया। बस वहाँ से यहाँ तक आने का ही कष्ट सहना पड़ा है। सो आपका सेवा-कार्य पा जाने के पश्चात् वह कष्ट भी सुख में परिवर्तित हो गया है।’’
मैंने मुस्कराते हुए पूछा, ‘‘परन्तु वे तो कहते थे कि बिना अपराध किये देवलोक में कोई निर्वासित नहीं किया जाता। तो क्या देवीजी ने कोई अपराध किया है?’’
‘‘अपराध करने पर निर्वासित नहीं की गई, प्रत्युत निर्वासित होने के लिए अपराध करना पड़ा है। मैं वहाँ से यहाँ आना चाहती थी और उस देश के विधि-विधानानुसार वहाँ की कोई लड़की वहाँ से बाहर के किसी मनुष्य के साथ विवाह-बन्धन में नहीं बँध सकती। आप वहाँ रह जाते तो कचिदात् वहाँ से निर्वासित होने के लिए मुझे अपराध नहीं करना पड़ता। मैं आनन्द से आपके साथ रहकर अपना जीवन व्यतीत कर देती। परन्तु आप वहाँ नहीं आये। अतः मैंने वहाँ से निर्वासित होने योग्य अपराध करना स्वीकार किया है। मैंने वहाँ के नियमों के विरुद्ध सुरराज की आज्ञा के बिना सन्तान उत्पन्न की है। यह अपराध ऐसा है कि इसके करने पर देवलोक से निर्वासित किया जाता है अथवा जीवन-भर बन्दी-गृह में लोक-सेवा कार्य करना पड़ता है।’’
‘‘मैंने षड्यन्त्र किया और एक देवता से सम्बन्ध स्थापित कर नियमपूर्वक सन्तति-निरोध की औषध नहीं ली। परिणाम मेरी गोद में है। जब इस बालक को जन्म दिया तो मैं पकड़ ली गई और मुझसे पूछा गया कि तीनों में से कौन-सा दण्ड मुझे स्वीकार है। मैंने निर्वासित होना स्वीकार किया और मुझसे पूछा गया कि मुझे कहाँ ले जाया जाये, मैं हस्तिनापुर पहुँचा दी गई।’’
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