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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
यह सुन मैं चकित रह गया। मुझको देवलोक के इतने कठोर नियम का ज्ञान नहीं था। मैं अभी विस्मय से उसका मुख देख ही रहा था कि उसने पुनः कहना आरम्भ किया, ‘‘जब आप मेरा चित्र बना रहे थे तो आपके मन में वासना व्याप्त देख मुझको प्रसन्नता हुई थी और मैंने स्वेच्छा से अपने को आपके अर्पण किया था। वास्तव में मैंने जान बूझकर, अब भी, सन्तति निरोध की औषध का सेवन नहीं किया था। परन्तु मैंने बता दिया था कि आपने इतने में अक्समात् मुझ पर बलात्कार किया कि औषध सेवन का समय ही नहीं था। मुझे आशा थी कि मुझे आपके साथ ही देवलोक से विदा कर दिया जायेगा। परंतु सुरराज ने इसको एक आकस्मिक घटना मान मुझको क्षमा कर दिया।
‘‘आप चले आये और मेरे लोमा उत्पन्न हुई। उसके उत्पन्न होने पर मैंने देवलोक से आपके पास आने का यत्न किया। मैंने अपनी लड़की में आपके तथा अपने प्रति प्रगाढ़ प्रेम उत्पन्न करने का यत्न किया। उसके अपने पिता के पास जाने के आग्रह के परिणाम में आपको वहाँ बुलाया गया। आपकी मुझको भी अपने साथ ले आने की बात ने मुझमें आपके प्रति पुनः लालसा उत्पन्न कर दी, परन्तु देवलोक से मुझे आने की स्वीकृति नहीं दी गई।’’
‘‘तदनन्तर मैंने यह षड्यन्त्र किया और मैं यहाँ आने में सफल हुई हूँ। इस पर भी मेरे मन में सन्देह था कि आप इस लड़की को देखकर मुझे स्वीकार करेंगे अथवा नहीं। मैं आपकी कृतज्ञ हूँ कि आपके कम-से-कम घर में तो रहने दिया है।’’
‘‘देखो उर्मिला! तुम मेरी कन्या लोमा की माँ हो। अतः तुमको घर से निकाल देने का तो प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता। रहा तुम्हारा पत्नी बनकर यहाँ रहना, वह कुछ अन्य बातों पर निर्भर करता है।’’
‘‘वह देख लिया जायेगा, आपकी सेवाओं का तो अवसर मिलेगा ही।’’
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