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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
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उर्मिला के आ जाने पर मैंने अपने सब बच्चों को हस्तिनापुर में बुला लिया और इस प्रकार एक लम्बा-चौड़ा परिवार का पुरखा बनकर मैं वहाँ रहने लगा। मुझसे कुछ विशेष कार्य नहीं लिया जा रहा था। इस पर भी समय-समय पर मुझसे सम्मति माँगी जाती थी।
एक समय आया कि हस्तिनापुर के प्रशान्त वातावरण में पुनः हल-चल मच गई। शतश्रृंग पर्वत से कुछ ऋषि-मुनि पाँच बालकों को लेकर हस्तिनापुर नगर से बाहर एक पंथागार में आकर ठहर गये।
मैं धृतराष्ट्र के पास बैठा नचिकेता की कथा सुना रहा था। कि प्रतिहारी ने आकर बताया, ‘‘श्रीमान्! सूचक एक सूचना लेकर आया है।’’
‘‘आने दो!’’ गान्धारी ने कहा।
मैं समझ गया कि उस सूचक के आने की सूचना इनको पहले से ही होगी। तभी तो बिना अपने पति से पूछे उसने सूचक को भीतर आने की आज्ञा दी थी। परन्तु जब सूचक भीतर आया और उससे वार्त्तालाप होने लगा तो मुझे विदित हुआ कि उसके आने के विषय में कोई पूर्व-सूचना इन लोगों को नहीं है। साथ ही सारी बातचीत गान्धारी ही कर रही थी। धृतराष्ट तो केवल मिट्टी के माधव की भाँति सुन रहे थे।
‘‘क्या सूचना है?’’ गान्धारी ने ही सूचक से पूछा।
‘‘नगर के उत्तरी द्वार वाले पंथागार में सात ऋषि और पाँच कुमार आकर टिके हैं। उनके आने का समाचार नगर में फैल रहा है और नागरिक नर-नारी, बालक-वृद्घ सब झुण्ड-के-झुण्ड उनके दर्शनों के लिए वहाँ जा रहे हैं।’’
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