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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
इस पर गान्धारी ने उद्विग्न होकर शकुनि को डाँट दिया। उसने कहा, ‘‘शकुनि! तुम महाराज को झूठ बोलने वाला समझते हो?’’
‘‘बहन, तुम नहीं समझ सकतीं, तुम चुप रहो।’’
जब बड़ों का इस प्रकार अपमान होने लगा तो मैं उठ खड़ा हुआ और धृतराष्ट्र से कहने लगा, ‘‘महाराज! मुझको अब जाने की स्वीकृति दीजिये।’’
‘‘क्यों, कहीं अन्यत्र कुछ काम है क्या?’’
‘‘काम तो नहीं महाराज! परन्तु जिस सभा में बड़ों का अपमान होने लग जाये, वहाँ मेरे जैसे सरल चित्त आदमी का कोई काम नहीं है।’’
‘‘इस शकुनि की बात को छोड़िए। अच्छा, आप बताइये, आपका क्या मत है इस विषय में? आप भी तो उस समय उपस्थित थे, जब भीष्मजी ने वह व्यवस्था दी थी?’’
‘‘आपकी स्मरण-शक्ति ठीक है। राजमाता सत्यवती के आग्रह पर ही भीष्मजी ने यह व्यवस्था दी थी। इस पर भी मेरी सम्मति यह है कि भीष्मजी को बीच में बैठाकर ही निर्णय होना चाहिए।’’
‘‘वे सठिया गए हैं।’’ शकुनि ने एक और तीर चला दिया।
धृतराष्ट्र ने शकुनि को डाँटकर कहा, ‘‘चुप रहो। यह हमारे परिवार की बात है। तुमको हमारे परिवार की प्रथाओं और उसकी व्यवस्थाओं में कहने का कोई अधिकार नहीं है।’’
मुझसे उन्होंने कहा, ‘‘सजंयजी! आप जाइये और उन कुमारों को देश बताइये कि क्या वे राज्य-कार्य के लिए उपयुक्त प्रतीत होते हैं।’’
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