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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
मैं वहाँ से जाना चाहता था और मुझको यह प्रतीत हुआ कि धृतराष्ट्र ने एक ढंग से मुझे जाने का आदेश दिया है।
मैं वहाँ से उठकर चला आया। मेरे मन में उत्सुकता उत्पन्न हो गई कि उनके दर्शन करूँ और उनके आचार-विचार की परख करूँ, जिससे कि इन्द्र की सम्मति, उनके हाथ में राज्य देने से भारत का कल्याण होगा, के विषय में अपनी धारणा बनाऊँ। अतः मैं राजप्रासाद से निकल, रथ में सवार हो नगर से बाहर तीन कोस की दूरी पर वहाँ जा पहुँचा, जहाँ ऋषियों के साथ पाण्डव ठहरे हुए थे।
पंथागार में साधारण व्यक्तियों की भाँति उन्होंने अपना डेरा जमाया हुआ था। ऋषि पंथागार के प्रांगण में यज्ञ कर रहे थे और पाण्डवों की माँ कुन्ती उस यज्ञ में यजमान बन बैठी हुई थी। नगर के सहस्त्रों नर-नारी उस यज्ञ को देख रहे थे। कुमार भी यज्ञशाला में ऋषियों के पीछे बैठे हुए थे।
मुझे तो प्रायः लोग जानते थे। इस कारण जब मैं वहाँ पहुँचा तो सबने मेरे आगे जाकर ऋषियों के समीप बैठने के लिए मार्ग छोड़ दिया। यद्यपि मैं नहीं चाहता था कि वहाँ जाकर बैठूँ और स्वयं को उनके साथ सम्बन्धित करूँ, इस पर भी जब अपने सामने मार्ग बनता देखा तो मैं वहाँ जाकर बैठने से स्वयं को रोक नहीं सका।
मैं कुमारों के समीप जाकर बैठ गया। वे चुपचाप दत्तचित्त यज्ञ हो रहा देख रहे थे। ऐसा प्रतीत होता था कि उनको यज्ञादिक देखने का अभ्यास है। पाँचों कुमार अवर्णनीय ओज और सम्मोहन के स्वामी थे। सहस्त्रों लोग केवल-मात्र उनको देखने के लिए ही आये प्रतीत होते थे। वे सब-के-सब मूर्तिवत् खड़े उनकी ओर निहार रहे थे।
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