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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
यज्ञ समाप्त हुआ तो ऋषियों में एक ने पूर्णाहुति देने से पूर्व एक संक्षिप्त-सा उपदेश दिया। यह उपदेश धर्म के विषय में था। ऋषि महाराज का कहना था, ‘‘व्यापक धर्म तो सदा, सर्वत्र और प्रत्येक परिस्थिति में समान ही होता है। वह मनु महाराज ने अपनी स्मृति में स्पष्ट रूप में लिख दिया है। साधारण धर्म, काल, स्थान, अवस्था, वर्ण तथा आश्रम के अनुसार पृथक्-पृथक् होता है। कुल धर्म को प्रथा कहते हैं। प्रथाएँ साधारण धर्म के विपरीत नहीं हो सकतीं। ये सब श्रुति अर्थात् मानव-कल्याण का विरोध करें तो त्याज्य हैं। अतः प्रत्येक व्यक्ति को अपने प्रत्येक कर्तव्य में सर्व-प्रथम मानवता का विचार करना चाहिए। मानवता का विचार तब हो सकता है, जब वह व्यक्ति अपने को मानव अर्थात् पशुओं से श्रेष्ठ माने। मानव-समाज के हित की ही बात धर्म है।’’
इस प्रकार संक्षिप्त उपदेश के पश्चात् ऋषियों ने यज्ञ में पूर्णाहुति दी।
तत्पश्चात् कुमार एक ऊँचे स्थान पर खड़े हो गये और भीड़ पंक्तिबद्ध हो उनको नमस्कार करती हुई सामने से दर्शन कर जाने लगी।
मैं यह सब-कुछ देख रहा था। मेरे मन में विचार आ रहा था कि यह सब क्या परिणाम उत्पन्न कर सकता है। मुझको हिरण्यकशिपु और प्रह्लाद की कथा स्मरण हो आई थी। जब हिरण्यकशिपु ने अहने सुकुमार पुत्र को, जो राम-नाम का स्मरण नहीं छोड़ता था, अग्नि से तप्त खम्भे से बाँधकर जला देने का आयोजन किया था, तब प्रजा में सुषुप्ति अवस्था में सदा विद्यमान नरसिंह निकल आया और उसने हिरण्यकशिपु को फाड़कर मार डाला। प्रजा का कोष तो भगवान् भी सहन नहीं कर सकता।
इस समय मुझको एक और घटना स्मरण हो आई। कौरवों के पूर्व पुरुष नहुष ने जब बलपूर्वक शचि को अपनी पत्नी बनाना चाहा और इसके लिए सप्त ऋषियों की सम्मति को न केवल ठुकरा दिया, प्रत्युत उनको अपना वाहन बना वह शचि को प्राप्त करने चल पड़ा। तब प्रजा में वह क्षोभ उत्पन्न हुआ कि नहुष के उस क्षोभ में चिथड़े उड़ गये।
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