|
उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
|
137 पाठक हैं |
हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
14
जब तक दर्शक-गण दर्शन करते रहे मैं ऋषियों के नेता जो उपदेश कर रहे थे, के समीप जा उनसे बात करता रहा। उन्होंने बताया, ‘‘ये कुमार वन में उत्पन्न हुए और वहीं पर पले हैं। इस पर भी ये राज्य में उचित पद पाने के योग्य हैं। यदि इनको उचित पद पर आसीन न किया गया तो हस्तिनापुर की प्रजा इनको अपना राजा मान लेगी। परिणाम यह होगा कि गृह-युद्ध हो जायेगा, जिसमें प्रजा इन कुमारों का पक्ष लेगी।’’
‘‘आप इनके लिए क्या उचित पद समझते है?’’
‘‘इनको राजकीय शिक्षा-दीक्षा मिले। तदनन्तर इनकी योग्यता और चरित्र के अनुसार इनको राज्य-भार सौंपा जाये।’’
मैं माता कुन्ती से भी मिला। उन्होंने कहा, ‘‘मैं अपने बच्चों को हस्तिनापुर में पढ़ा-लिखकर योग्य बनाने के लिए लाई हूँ। अभी तो जनसाधारण ही ने इनको देखने की उत्सुकता प्रकट की है। मैं इस बात की प्रतीक्षा में हूँ कि इनके दादा, दादी, ताया अथवा भाई इत्यादि कब आते हैं! मेरे पति की अस्थियाँ भी आई हैं। उनका श्राद्ध भी होना है।’’
मैं कुमारों के यहाँ से लौटकर अपने घर पर पहुँचा तो मेरे सेवक ने मुझे बताया कि भीष्मजी ने मुझे बुलाया है। अब बिना विश्राम किये मैं उनके निवास-स्थान पर जा पहुँचा। वहाँ जाकर मुझे बताया गया कि मैं राजमाता सत्यवती के प्रासाद की ओर चला जाऊँ।
मैं वहाँ पहुँचा तो देखा कि परिवार के सभी सदस्य बैठ कर पाण्डवों के विषय में विचार-विमर्श कर रहे हैं। दुर्योधन के सब भाई जो तनिक भी ज्ञान रखते थे, वहाँ उपस्थित थे। वे लगभग सब साठ थे, जो वहाँ पर उपस्थित थे। सब दुर्योधन को अपना अगुआ मानते थे और उसके कथन का सर्वथा समर्थन करते थे। दुर्योधन जब भी कोई ऐसी बात आती जिसका उत्तर वह नहीं दे सकता था, अपने मामा शकुनि का मुख देखने लगता था। शकुनि उस बात का उत्तर दे देता था।
|
|||||

i 









