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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
‘‘कुमारों से तो पूछा नहीं, परन्तु उनकी माता से बात की थी। वे दो केवल दो बातें चाहती हैं। एक तो उनके पति की अस्थियों का विधिवत् विसर्जन किया जाय और दूसरे उनके पुत्रों की उचित शिक्षा-दीक्षा का प्रबन्ध हो जाय।’’
भीष्मजी ने पूछा, ‘‘ऋषियों की क्या इच्छा है? वे इन कुमारों को यहाँ लेकर क्यों आये हैं?’’
‘‘उनसे भी बात हुई थी। वे चाहते हैं कि राजकुमारों को उनकी पद के अनुरूप शिक्षा-दीक्षा का प्रबन्ध किया जाय।’’
इस पर भीष्मजी ने कहा, ‘‘यह तो उचित ही है। इतना कुछ तो होना ही चाहिए।’’
शकुनि उठकर कहने लगा, ‘‘परन्तु मैं कहता हूँ कि इस बात का आज ही निर्णय हो जाना चाहिए कि कुरु-राज्य दुर्योधन को ही मिलेगा। यदि यह निर्णय न दिया गया तो मैं अपनी बहन और भांजों को लेकर गान्धार चला जाऊँगा और फिर कुरु-राज्य को विजय कर हम गान्धारी के पुत्रों का राज्य स्थापित करेंगे।’’
‘‘एक बात मैं और भी बता देना चाहता हूँ। इस बार युद्ध गान्धार और भारत के सम्राट् के भीतर न रहकर देश-व्यापी हो जायेगा। अधिकांश लोग हमारी सहायता करेंगे। सत्यवती के ज्येष्ठ पुत्र भीष्मजी जो अपना वचन-भंग कर राज्य सत्यवती की सन्तान की अपेक्षा किसी अज्ञात पिताओं के पुत्रों को देने जा रहे हैं–अपने भाईयों की सन्तान से लड़ेंगे।’’
भीष्म चुप हो गए। वह अपनी निन्दा सहन नहीं कर सकते थे। वास्तव में जिस बात के लिए उन्होंने अपने पूर्ण जीवन और उसके समग्र सुखों की आहुति दी थी, उसको वह छोड़ नहीं सकते थे।
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