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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
उन्होंने बहुत देर तक विचार कर कहा, ‘‘सुनो, मैं अपनी व्यवस्था, कि धृतराष्ट्र और पांडु की सन्तानों में से सबसे ज्येष्ठ युवराज होगा, को एक शर्त पर वापस ले लेता हूँ। वह शर्त यह है कि जब पांडु-पुत्र सज्ञान हो जायेंगे, उनको एक पृथक् राज्य स्थापित करने के लिए पर्याप्त स्थान जो वीरान होगा, दे दूँगा।’’
इस पर दुर्योधन ने कहा, ‘‘ठीक है, स्थान दे दीजियेगा, परन्तु इस राज्य की ओर से उनको किसी प्रकार की सहायता नहीं दी जायगी।’’
‘‘अच्छी बात है, नहीं दी जायगी। परन्तु उनके सज्ञान होने तक वे राजकुमारों की भाँति यहाँ रहेंगे और उनकी प्रत्येक प्रकार की शिक्षा-दीक्षा का प्रबन्ध राज्य की ओर से होगा।’’
गान्धारी ने कह दिया, ‘‘स्वीकार है। साथ ही कुन्ती के पति की अस्थियों का नदी में विधिवत् विसर्जन और श्राद्ध इत्यादि भी होगा।’’
इस प्रकार बात समाप्त हो गई।
मैंने सुख की साँस ली और समझा कि इन्द्र की भविष्यवाणी कि ये कुरुवंशीय धर्म का मार्ग स्वीकार नहीं करेंगे और निश्चय ही परस्पर झगड़ा कर अपना सर्वनाश कर लेंगे, असत्य सिद्ध होगी। देवताओं की योजना भारत में सुव्यवस्था स्थापित करने के लिए एक महान् शक्ति का प्रादुर्भाव, व्यर्थ हो जायगी। मैंने मन में विचार कर लिया था कि इन्द्र को जाकर बताना चाहिए कि अभी भी मानवों में मानवता है और वे अपनी समस्याओं को स्वयं सुलझाने की सामर्थ्य रखते हैं।’’
जब पांडवों को राजप्रासाद में लाया गया तो हस्तिनापुर की पूर्ण प्रजा मार्ग के तट पर आकर पुष्पवर्षा करने लगी। आकाश से इन्द्रादि देवता पुष्पवर्षा करने और पांडवों को बधाई तथा आशीर्वाद देने के लिए आये।
मैंने समझा कि अब भारत में शान्ति स्थापित हो सकेगी। इसके लिए दैवी शक्तियों को कष्ट करने की आवश्यकता अब नहीं रही।
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