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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।

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यह था, अन्त, मणिकलाल के टाइप किये हुए पृष्ठों में अंकित कहानी का। उसने कहानी लिखने के पश्चात् लिखा–

वैद्यजी! आशा है कि विदेश-यात्रा पर जाने से पूर्व इस कथा का दूसरा अंश आपकी सेवा में भेज सकूँगा। मैं अपने लिखे और महर्षि कृष्ण द्वैपायनजी के लिखे अन्तर को जानता हूँ। विशेष अन्तर तो सीमित दृष्टि के कारण है। न तो महर्षि सर्वज्ञ थे, न ही मैं स्वयं को सर्वज्ञ मानता हूँ। जो-जो मैंने देखा और समझा उसको वैसा ही लिख दिया है।

शेष फिर।’’

महाभारत कथा का प्रथम खण्ड ‘अवतरण’ समाप्त हुआ। इस कथा की द्वितीय खण्ड ‘सम्भवामि युगे-युगे’ (दो भागों में) तथा तृतीय खण्ड ‘विनाशाय च दुष्कृताम्’ भी (दो भागों में) उपलब्ध है।

समाप्त

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