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उपन्यास >> नदी के द्वीप

नदी के द्वीप

सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :149
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9706

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व्यक्ति अपने सामाजिक संस्कारों का पुंज भी है, प्रतिबिम्ब भी, पुतला भी; इसी तरह वह अपनी जैविक परम्पराओं का भी प्रतिबिम्ब और पुतला है-'जैविक' सामाजिक के विरोध में नहीं, उससे अधिक पुराने और व्यापक और लम्बे संस्कारों को ध्यान में रखते हुए।


रेखा ने पहले उत्तर दिया, “हाँ समझ लो।”

भुवन ने नकल लगाते हुए कहा, “और मैं भी, हाँ, समझ लो।” फिर कहा, “अच्छा, जल्दी से चाय पी लीजिए - आगे जाना है तुरन्त।”

“कहाँ?”

“आगे। इंटु द ब्लू। क्रूसोलैण्ड। चाय का मज़ा क्यों बिगाड़ती हैं - पी लीजिए और चलिए।”

रेखा मुस्करा दी। चाय से उठकर वे बाहर आये तो भुवन ने कहा, “आपके बक्स-वक्स में कहीं जगह हो तो यह पैकेट उसमें रख दीजिए।”

रेखा ने दुष्टता से कहा, “इतना बड़ा टूथ ब्रश। जरा मैं देखूँ।” और भुवन के रोकते न रोकते उसने पैकेट खोल कर झांका ही तो।

दो कमीजें, एक फ्लैनल की पैंट, एक पाजामा, एक-आध और छोटी चीजें, और, हाँ, एक टूथ-ब्रश भी।

रेखा ने कहा, “हाँ, है तो सही टूथ-ब्रश। पर यह सब रेडी-मेड क्या ले आये आप?”

“तो आप का क्या ख़याल था, आपका फ़ालतू कम्बल लपेटे घूमूँगा?” भुवन हँस पड़ा, और अपने पतले कुरते की ओर देखने लगा।

रेखा ने गम्भीर होकर माफ़ी माँगी। सहसा उसे ध्यान हुआ, भुवन को यों खींच लाने में भावुकता का कितना बड़ा प्रमाद उसने किया है।

भुवन ने उसकी बात काटकर कहा, “जल्दी कीजिए रेखा जी, सामान उठवाना है।”

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