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उपन्यास >> नदी के द्वीप

नदी के द्वीप

सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :149
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9706

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व्यक्ति अपने सामाजिक संस्कारों का पुंज भी है, प्रतिबिम्ब भी, पुतला भी; इसी तरह वह अपनी जैविक परम्पराओं का भी प्रतिबिम्ब और पुतला है-'जैविक' सामाजिक के विरोध में नहीं, उससे अधिक पुराने और व्यापक और लम्बे संस्कारों को ध्यान में रखते हुए।


रेखा सामान रख रही थी तो उसने पूछा, “दस-बारह-पन्द्रह मील चल सकती हैं? वैसे मोटर भी जाती है, पर आगे भी कुछ चलना पड़ेगा।”

“ज़रूर चल सकती हूँ। पैदल ही चलूँगी। लेकिन कहाँ जाएँगे? सात-ताल?”

“नहीं।” भुवन फिर मुस्करा दिया। “क्रूसोलैण्ड - मैंने कहा न? बताने से जादू चला जाता है।”

भुवन कुली साथ ले आया था। सामान उठवाया और बोला, “चलो, हम लोग आते हैं। डाक बंगले पर जाकर बैठना।”

कुली चल पड़े।

“कहाँ के डाक बंगले-यह बता दिया है?”

“वह सब मैं ठीक कर आया हूँ - आप किसी उपाय से पहले नहीं जानने पाएँगी!” रास्ता उतार का था। दोनों बड़ी तेज़ी से उतरने लगे।

भुवन ने कहा, “अगर तेज़ चलने की बात न होती, तो मैं आपसे गाने का अनुरोध करता।”

रेखा ने रुकते-रुकते शब्दों में कहा, “नहीं - इस वक़्त-हवा को ही गाने दीजिए।”

लेकिन दो-तीन मील जाकर जब वे एक खुली जगह सामने का दृश्य देखने के लिए रुके, तब रेखा सहसा खुले गले से किसी भटियाली पद के बीच में से ही गा उठी :

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