उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
दोपहर का निर्जन समय यों ही निरर्थक चला गया, यह सोचकर मैं क्रुद्ध हो उठा; परन्तु संध्या के बाद वह फिर आएगा और एक छोटा-सा अनुरोध- नहीं तो लिखा हुआ एक पुर्जा- जो कुछ भी हो, गुप-चुप हाथ में थमा जायेगा; इसमें मुझे जरा भी संशय नहीं था; किन्तु यह समय कटे किस तरह? सामने की ओर देखते ही कुछ दूर पर विशाल जल-राशि एकदम मेरी आँखों के ऊपर झक्-झक् कर उठी। वह किसी विस्मृत जमींदार का विशाल यश था। वह तालाब करीब आधा कोस विस्तृत था। उत्तर की ओर से वह खिसक कर पुर गया था और घने जंगल से ढँक गया था। गाँव के बाहर होने के कारण गाँव की स्त्रियाँ उसके जल का उपयोग नहीं कर पाती थीं। बातों ही बातों में सुना था कि यह तालाब कितना पुराना है और किसने बनवाया था, इसका पता किसी को नहीं है। एक पुराना टूटा घाट था, उसी के एकान्त कोने में जाकर मैं बैठ गया। एक समय इसके चारों ओर बढ़ता हुआ गाँव था जो न जाने कब हैजे और महामारी के प्रकोप से ऊजाड़ होकर, फिर अपने वर्तमान स्थान में, सरक आया है। छोड़े हुए मकानों के बहुत-से निशान चारों ओर विद्यमान हैं। डूबते हुए सूर्य की तिरछी किरणों की छटने धीरे-धीरे झुककर तालाब के काले पानी में सोना मथ दिया, मैं एकटक होकर देखता रहा।
इसके बाद धीरे-धीरे सूर्य डूब गया। तालाब का काला पानी और भी काला हो गया। पास के ही जंगल में से दो-एक प्यासे सियार बाहर निकल कर डरते-डरते पानी पीकर चले गये। वहाँ से मेरे उठने का समय हो गया है - जिस समय को काटने के लिए मैं वहाँ गया था वह कट गया है, यह सब अनुभव करके भी मैं वहाँ से उठ न सका- मानों उस टूटे घाट ने मुझे जबरन बिठा रखा!
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