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उपन्यास >> श्रीकान्त

श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


हरेक घटना का कारण जानने की जिद मनुष्य को जिस अवस्था में होती है उस अवस्था को मैं पार कर गया हूँ। इसलिए, किस तरह उस सूचीभेद्य अन्धकार-पूर्ण आधी रात को मैं अकेला, रास्ते को पहिचानता हुआ, तालाब के टूटे घाट से इस महाश्मशान के समीप आ उपस्थित हुआ, और किसके कदमों की वह आवाज... उस स्थान से बुलाती और इशारा करती हुई, इतनी ही देर में सामने विलीन हो गयी, इन सब प्रश्नों की मीमांसा करने जैसी बुद्धि मुझमें नहीं है। पाठकों के समीप अपने इस दैन्य को स्वीकार करने में मुझे जरा भी लज्जा नहीं है। यह रहस्य आज भी मेरे समीप उतने ही अन्धकार से ढँका हुआ है। परन्तु, इसीलिए, प्रेत-योनि को स्वीकार करना भी इस स्वीकारोक्ति का प्रच्छन्न तात्पर्य नहीं है। क्योंकि, अपनी आँखों मैंने देखा है- हमारे गाँव में एक पागल था। वह दिन को, घर-घर घूमकर, भीख माँगकर खाता था और रात को बाँस के ऊपर कपड़ा डालकर, और उसे सामने की ओर ऊँचा करके, रास्ते-रास्ते बगीचों के झाड़ों की छाया में, घूमता-फिरता था। उसके चेहरे को देखकर अंधेरे में न जाने कितने लोगों की दँतौरी बँध बँध गयी है। इसमें उसका कोई स्वार्थ नहीं था, फिर भी यह उसका अंधेरी रात का नित्य का काण्ड था। मनुष्य को व्यर्थ ही डर दिखाने के लिए और भी जितने प्रकार के अद्भुत ढंग वह करता था उनकी सीमा नहीं थी। सूखी लकड़ियों के गट्ठे को पेड़ की डाल से बाँधकर उसमें आग लगा देता, मुख पर काली स्याही पोत कर विशालाक्षी देवी के मंदिर में बहुत क्लेश सहते हुए खड़ा रहता और उठा-बैठा करता, गहरी रात के समय घर के पिछवाड़े बैठकर नाक के सुर से किसानों के नाम ले-लेकर पुकारा करता- परन्तु, फिर भी, कोई किसी दिन उसे पकड़ न पाया। दिन के समय उसका चाल-चलन, स्वभाव-चरित्र आदि देखकर उस पर जरा-सा सन्देह करने की बात किसी के भी मन में उदय नहीं हुई। और यह केवल हमारे ही गाँव में नहीं - पास के आठ-दस गाँवों में भी वह यही करता फिरता था। मरते समय वह अपनी बदजाती खुद ही स्वीकार कर गया और उसके मरने के बाद भूत का उपद्रव भी वहाँ बन्द हो गया। इस क्षेत्र में भी शायद वैसा ही कुछ था-शायद नहीं भी हो। परन्तु जाने दो इस बात को।

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