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उपन्यास >> श्रीकान्त

श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


हाँ, कह रहा था कि, उस धूल और रेती से भरे हुए बाँध के ऊपर जब मैं हतबुद्धि-सा होकर बैठ गया तब केवल दो लघु पद-ध्वंनियाँ भीतर जाकर धीरे-धीरे विलीन हो गयीं। खयाल आया, मानो उसने स्पष्ट करके बता दिया हो- “राम-राम, तूने यह क्या किया? मुझे इतनी दूर तक रास्ता बताकर ले आया, सो क्या वहाँ बैठ जाने के लिए? आ, आ, एक दफा हम लोगों के भीतर चला आ। इस तरह अपवित्र अस्पृश्य के समान प्रांगण के एकान्त में मत बैठ - हम सबके बीच में आकर बैठ।” यह बात मैंने कानों से सुनी थी या हृदय के भीतर अनुभव की थी, सो अब याद नहीं कर सकता। परन्तु, उस समय भी जो मुझे होश बना रहा, इसका कारण यह है कि चैतन्य को जबर्दस्ती पकड़ रखने से वह यों ही एक-प्रकार से बचा रहता है। बिल्कुल ही नहीं चला जाता, यह मैंने अच्छी तरह देखा है। इसलिए यद्यपि दोनों आँखों को खोलकर मैं देखता रहा, परन्तु वह मानो तन्द्रा का देखना था। वह न तो नींद ही थी और न जागरण ही था। उसमें निद्रित का विश्राम भी नहीं रहता और जाग्रत का उद्यम भी नहीं आता।

फिर भी मैं इस बात को नहीं भूला कि बहुत रात बीत गयी है, मुझे तम्बू में लौटना है और उसके लिए कम-से-कम एक बार चेष्टा तो करनी चाहिए; किन्तु, मन में लगा कि यह सब व्यर्थ है। यहाँ पर मैं अपनी इच्छा से तो आया नहीं हूँ, आने की कल्पना भी नहीं की; इसलिए, जो मुझे इस दुर्गम रास्ते पर रास्ता दिखलाकर लाया है, उसका कुछ विशेष प्रयोजन है। वह मुझे यों ही न लौट जाने देगा। पहले मैंने सुना था कि अपनी इच्छा से इनके हाथों से छुटकारा नहीं मिलता। चाहे जिस रास्ते, चाहे जिस तरह, जोर करके क्यों न निकलो, सब रास्ते गोरख धन्धे की तरह घुमा-फिराकर पुरानी जगह पर ही लाकर हाजिर कर देते हैं!

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