उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
इसलिए, चंचल होकर छटपटाना सम्पूर्ण तौर से अनावश्यक समझकर, मैं किसी तरह की हिलने-डुलने की भी चेष्टा किये बिना, जब स्थिर होकर बैठ गया तब जो वस्तु अकस्मात् देख पड़ी, वह मुझे किसी दिन भी विस्मृत नहीं हुई।
रात्रि का भी स्वतन्त्र रूप होता है और उसे, पृथ्वी के झाड़-पाले, गिरिपर्वत आदि जितनी भी दृश्यमान वस्तुएँ हैं उनसे, अलग करके देखा जा सकता है, यह मानो आज पहले मेरी दृष्टि में आया। मैंने आँख उठाकर देखा कि अन्तहीन काले आकाश के नीचे, सारी पृथ्वी पर आसन जमाए, गम्भीर रात्रि आँखें मूँदे ध्यान लगाए बैठी है और सम्पूर्ण चराचर विश्व मुख बन्द किये, साँस रोके, अत्यन्त सावधानी से स्तब्ध होकर उस अटल शान्ति की रक्षा कर रहा है। एकाएक आँखों के ऊपर से मानो सौन्दर्य की एक लहर दौड़ गयी। मन में आया कि किस मिथ्यावादी ने यह बात फैलाई है कि केवल प्रकाश का ही रूप होता है, अन्धकार का नहीं? भला, इतना बड़ा झूठ मनुष्य ने किस तरह चुपचाप मान लिया होगा? यह तो आकाश और मर्त्य, सबको परिव्याप्त करके, दृष्टि से भीतर-बाहर अन्धकार का पूरा बढ़ा आ रहा है। वाह-वाह! ऐसा सुन्दर रूप का झरना और कब देखा है! इस ब्रह्माण्ड में जो जितना गम्भीर, जितना अचिन्त्य, जितना सीमाहीन है - वह उतना ही अन्धकारमय है। अगाध समुद्र स्याही जैसा काला है; अगम्य गहन अरण्यानी भीषण अन्धकारमय है। सर्व लोगों का आश्रय, प्रकाश का भी प्रकाश, गति की भी गति, जीवन का भी जीवन, सम्पूर्ण सौन्दर्य का प्राण-पुरुष भी, मनुष्य की दृष्टि में निबिड़ अन्धकारमय है। मृत्यु इसीलिए मनुष्य की दृष्टि में काली है, और इसीलिए उसका परलोक-पन्थ इतने दुस्तर अंधेरे में मग्न है! इसीलिए राधा के दोनों नेत्रों में समाकर जिस रूप ने प्रेम के पूर में जगत को बहा दिया, वह भी घनश्याम है। मैंने कभी ये सब बातें सोची नहीं, किसी दिन भी इस रास्ते चला नहीं; फिर भी न जाने किस तरह इस भय से भरे हुए महाश्मशान के समीप बैठकर, अपने इस निरुपाय नि:संग अकेलेपन को लाँघकर, आज सारे हृदय में एक अकारण रूप का आनन्द खेलने फिरने लगा और बिल्कुल एकाएक यह बात मन में आई कि काले में इतना रूप है, सो पहले तो किसी दिन समझा नहीं!
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