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उपन्यास >> श्रीकान्त

श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


मुझे उस समय यह सुबुद्धि सूझ आई कि रास्ता छोड़कर मेरा दूर खिसक जाना आवश्यक है। क्योंकि, आगन्तुकों का दल चाहे कितना भी बुद्धिमान और साहसी क्यों न हो, एकाएक इस अंधेरी रात्रि में, इस तरह के स्थान में मुझे अकेला भूत की तरह खड़ा देखकर चाहे और कुछ न करे, परन्तु एक विकट चीख-पुकार अवश्य मचा देगा, इसमें कोई सन्देह नहीं।

मैं लौटकर अपनी पुरानी जगह पर जा खड़ा हुआ; और थोड़े समय बाद ही दो चटाई लगी हुई बैलगाड़ियाँ, पाँच-छह आदमियों के पहरे में, मेरे सामने आ पहुँचीं। एक बार खयाल आया कि आगे चलने वाले दो आदमी मेरी ओर देखकर, क्षण काल के लिए स्थिर हो, खड़े रहे और अत्यधिक धीमे स्वर में मानो कुछ कह-सुनकर आगे चले गये; और थोड़ी-सी ही देर में वह सारा दल, बाँध के किनारे की एक झाड़ी की ओट में, अदृश्य हो गया। यह अनुभव करके कि रात अब अधिक बाकी नहीं रही है, जब मैं लौटने की तैयारी कर रहा था, ठीक उसी समय उन वृक्षों की ओट में से आती हुई खूब ऊँचे कण्ठ की पुकार कानों में आई, “श्रीकान्त बाबू-”

मैंने उत्तर दिया, “कौन है रे, रतन?”

“हाँ बाबू, मैं ही हूँ। जरा आगे बढ़ आइए।”

जल्दी से बाँध के ऊपर चढ़कर पुकारा, “रतन, तुम लोग क्या घर जा रहे हो?”

रतन ने उत्तर दिया, “हाँ, घर जा रहे हैं- माँ गाड़ी में हैं।”

मेरे निकट पहुँचते ही प्यारी ने पर्दे में से मुँह बाहर निकालकर कहा, “दरबान की बात सुनकर ही मैं समझ गयी थी कि तुम्हें छोड़ और कोई नहीं है, गाड़ी पर आओ, कुछ बात करनी है!”

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