उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
मैंने निकट आकर पूछा, “क्या बात है?”
“कहती हूँ, ऊपर आ जाओ।”
“नहीं, ऐसा नहीं कर सकता, समय नहीं है। सुबह होने के पहले ही मुझे तम्बू में पहुँचना है!” प्यारी ने हाथ बढ़ाकर चट से मेरा दाहिना हाथ पकड़ लिया और तेज ज़िद के स्वर में कहा, “नौकर-चाकरों के सामने छीना-झपटी, मत करो - तुम्हारे पैर पड़ती हूँ, चुपचाप ऊपर चढ़ आओ...”
उसकी अस्वाभाविक उत्तेजना से मानो कुछ हत-बुद्धि-सा होकर मैं गाड़ी पर चढ़ गया। प्यारी ने गाड़ी को हाँकने की आज्ञा देकर कहा, “आज फिर इस जगह क्यों आए?”
मैंने सच-सच बात कह दी, “नहीं मालूम, क्यों आया।”
प्यारी ने अब तक भी मेरा हाथ नहीं छोड़ा था। बोली, “तुम्हें नहीं मालूम? अच्छा, ठीक, परन्तु छिपकर क्यों आए थे?”
मैं बोला, “यह ठीक है कि यहाँ आने की बात किसी को मालूम नहीं है, किन्तु छिपकर नहीं आया हूँ।”
“यह झूठ बात है!”
“नहीं।”
“इसका मतलब?”
“मतलब यदि खोलकर बता दूँगा तो विश्वास करोगी? न तो मैं छिपकर ही आया हूँ, और न मेरी इच्छा ही आने की थी।”
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