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प्रेमचन्द की कहानियाँ 26

प्रेमचंद

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2017
पृष्ठ :150
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9787

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प्रेमचन्द की सदाबहार कहानियाँ का छब्बीसवाँ भाग


बुढ़ापे की औलाद बहुत प्यारी होती है। इस नवजात बच्चे ने, जिसका नाम नौनीचंद रखा गया था, अपने बूढ़े माँ-बाप की किस्मत जगा दी। उनकी मोहब्बत चारों तरफ़ से सिमट कर उस पर जम गई। वह लड़का नहीं था, उनकी जीवन भर की आसाएं और आरजूओं ने इंसानी शक्ल अख्तियार कर ली थी।

मगर बूढ़े माँ-बाप की तक़दीर में बच्चे का मुख देखना नहीं बदा था। तीसरे साल उसकी माँ बीमार पड़ी। उसे मालूम हुआ कि अब मैं नहीं बचूँगी। तब उसने कुंदन को बुलाया। कुंदन जाने से जरूर इंकार कर देती, क्योंकि अब उसे अपने माँ-बाप से नफ़रत हो गई थी, मगर उन दिनों देश में प्लेग फैला हुआ था। कुंदन को इंकार करने की जुर्रत न हो सकी।

कुंदन की माँ उसे देखकर बहुत खुश हुई और खूब रोई। बाप ने हजारों दुआएँ दीं, मगर मकान की महरियाँ और लौंडियाँ इस मेहमान को देखकर जल गईं और उसकी तरफ़ व्यंग्य-भरी निगाहों से देखतीं। अक्सर उससे बेअदबी कर बैठतीं।

महरी कहती- ''अब कोई कहाँ तक पानी भरे! दिन-भर पानी ढोते-ढोते कूल्हा रह जाता है।''

महराजन कहती- ''ये लड़के जाने कहाँ के मरभुक्खे हैं। चूल्हा जला नहीं कि सब आकर घेर लेते हैं।''

कुंदन यह सब सुनती और पी जाती। अपनी माँ की तकलीफ़ देखकर उसका दिल कुछ-कुछ पिघल गया था। आखिर एक रोज बूढ़ी औरत की हालत बहुत नाजुक हो गई। उसने नौनीचंद का हाथ पकड़कर कुंदन के हाथ में दिया और रोती हुई दुनिया से सिधार गई।

माँ के मरते ही कुंदन के मिजाज में एक खुशी लाने वाली तब्दीली वाक्या हुई। नौनीचंद से जो उसे नफ़रत थी, वह जाती रही। उस मुरझाए हुए यतीम बच्चे को देखकर उसे उस पर तरस आता। जब उसके अपने लड़के नोनी को मारते और वह आँखों में आँसू भरे हुए आता और जीजी का आँचल पकड़कर फ़रियाद करता, तो कुंदन का कलेजा मसोस उठता और नौनी को ममता के साथ गोद में उठा लेती और कलेजे से चिपटाकर प्यार करती। कुंदन के मिजाज में यह तबदीली यों वाकए हुई, शायद इसीलिए कि बूढ़ी माँ ने बच्चे को उसके सुपुर्द किया था, या मुमकिन है बेकसी के ख्याल ने नफ़रत पर फ़तह पाई हो। बहरहाल कुंदन अपने भाई को अपने बच्चे से ज्यादा चाहने लगी। नौनी की फ़रियाद अब अकारथ नहीं जाती। अगर कभी बच्चों जैसे झगड़े में नौनी ही पहल करता तो भी कुंदन उसे सजा न देती। नौनी को रोता देखकर उसका कलेजा फटने लगता था और बच्चा भी उससे कुछ ऐसा हिला कि अपनी माँ को भूल गया। तीन महीने के बाद कुंदन का बाप भी मरा। उसने अपनी वसीयत में जयगोपाल को नौनी का सरपरस्त करार दिया और गुज़ारे के लिए उसे एक गाँव भी दिया। कुंदन अब उस घर की मालिक हुई और नौनी उसके दिल का।

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