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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2017
पृष्ठ :716
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9824

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महात्मा गाँधी की आत्मकथा


धीरे-धीर गोरे सिपाहियो के साथ भी मेरा परिचय हो गया और उन्होंने मुझे रोकना बन्द कर दिया। इस सेना में सन् 1896 में मेरा घोर विरोध करने वाले कर्नल स्पार्क्स औऱ कर्नल वायली थे। वे मेरे इस कार्य से आश्चर्य चकित हो गये। मुझे खास तौर से बुलाकर उन्होंने मेरा उपकार माना। वे मुझे जनरल मेंकेंजी के पास भी ले गये और उनसे मेरा परिचय कराया।

पाठक यह न समझे कि इनमे से कोई पेशेवर सिपाही थी। कर्नल वायली प्रसिद्ध वकील थे। कर्नल स्पार्क्स कसाईखाने के मशहूर मालिक थे। जनरल मेंकेंजी नेटाल के प्रसिद्ध किसान थे। वे सब स्वयंसेवक थे और स्वयंसेवको के नाते ही उन्होंने सैनिक शिक्षा और अनुभव प्राप्त किया था।

कोई यह न माने कि जिन बीमारो के सेवा शुश्रूषा का काम हमे सौपा गया था, वे किसी लड़ाई में घायल हुए थे। उनमें से एक हिस्सा उन कैदियो का थास जो शक में पकड़े गये थे। जनरल ने उन्हे कोड़ो की सजा दी थी। इन कोड़ो की मार से जो घाव पैदा हुए थे, वे सार-संभाल के अभाव में पक गये थे। दूसरा हिस्सा उन जुलूओ का था, जो मित्र माने जाते थे। इन मित्रों को सिपाहियो ने भूल से घायल किया था, यद्यपि उन्होंने मित्रता सूचक चिह्न धारण कर रखे थे।

इसके अतिरिक्त स्वयं मुझे गोरे सिपाहियो लिए भी दवा लाने और उन्हे दवा देने का काम सौपा गया था। डॉ. बूथ के छोटे से अस्पताल में मैंने एक साल कर इस काम की तालीम ली थी, इससे यह काम मेरे लिए सरल हो गया था। इस काम के कारण बहुत से गोरो के साथ मेरा अच्छा परिचय हो गया था।

पर लड़ाई में व्यस्त सेना किसी एक जगह पर तो बैठी रह ही नहीं सकती थी। जहाँ से संकट के समाचार आते वही वह दौड जाती थी। उसमें बहुत से तो घुडसवार ही थे। केन्द्र स्थान से हमारी छावनी उठती कि हमे उसके पीछ पीछ अपनी डोलियाँ कन्धे पर उठाकर चलना पड़ता था। दो-तीन मौको पर तो एक ही दिन में चालीस मील की मंजिल तय करनी पड़ी। यहां भी हमें तो केवल प्रभु का ही काम मिला। जो जुलू मित्र भूल से घायल हुए थे उन्हें डोलियो में उठाकर छावनी तक पहुँचाना था और वहाँ उनकी शुश्रूषा करनी थी।

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