उपन्यास >> सुमति सुमतिगुरुदत्त
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बुद्धि ऐसा यंत्र है जो मनुष्य को उन समस्याओं को सुलझाने के लिए मिला है, जिनमें प्रमाण और अनुभव नहीं होता।
‘‘मैं इस सृष्टि का वास्तिव रहस्य समझना चाहता हूँ।’’
‘‘उसके लिए आप उपनिषदों का अध्ययन कीजिए। उपनिषद् के अर्थ ही रहस्य के हैं। इस संसार में तीन मूल पदार्थ है। उन मूल पदार्थों के रहस्य का वर्णन उपनिषद् में किया गया है।’’
‘‘कौन-कौन से तीन पदार्थ हैं?’’
‘‘देखिए कहा है–
ह्येका भोक्त् भोग्यार्थयुक्ता
अनन्तश्चात्मा विश्वरूपो ह्यकर्ता
त्रयं यदा विन्दते बह्ममेतत्।।
‘‘अर्थात् सर्वज्ञ और अल्पज्ञ दो प्रकार के जीव अजन्मा हैं। एक अजन्मा प्रकृति भी है जो भोक्ता द्वारा भोग की जाती है। ये तीन ब्रह्म अर्थात् महान् पदार्थ हैं। परमात्मा, जो विश्व का आत्मा है, वह अनन्त है। इस प्रकार जानना चाहिए कि ये तीन ब्रह्म हैं।’’
‘‘तो प्रकृति भी ब्रह्म है?’’
‘‘ब्रह्म का अभिप्राय परमात्मा से नहीं है। परमात्मा के लिए ईश्वर शब्द का प्रयोग हुआ है।’’
‘‘सुमति! तुम इतनी अल्पायु में इस प्रकार के तत्त्व की बातें जानती हो?’’
‘‘यह तो कुछ भी नहीं। ज्ञान तो अनन्त है। इसका कारण पुरोहितजी हैं। मैं उनके द्वारा पालित तथा उनके द्वारा ही शिक्षित हूँ। फिर भी आपकी परिभाषा के अनुसार मैं अशिक्षित ही हूँ।’’
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