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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘मैं तो यह नहीं कह सकती। मुझको भगेरिया साहब ने उससे मिलने से मना किया हुआ है।’’

‘‘क्यो?’’

‘‘उनको संदेह है कि मैं उसपर मोहित हो जाऊँगी। इसीलिए तो कह रही थी कि यहाँ के धनी आदमियों का युक्ति करने का ढँग ही विलक्षण है।’’

‘‘तो हमको ही मिलना चाहिए।’’ ललिता ने कह दिया।

चाय के पश्चात् ललिता और शकुन्तला बिहारीलाल के होस्टल में जा पहुँचीं। वह अपनी पढ़ाई में संलग्न था, इस कारण उसने आने का प्रयोजन जानकर कहा, ‘‘शकुन्तला बहिन ! मुझको आज ही देवगढ़ से एक पत्र मिला है और मैं समझता हूँ कि उससे यहाँ होने वाली घटना का अर्थ समझा जा सकता है। मैं वह पत्र तुमको दे देती हूँ। तुम पढ़कर मुझको वापस कर देना। साथ ही यह पत्र सेठजी को दिखाना नहीं। मैं नहीं चाहता कि पहले से बिगड़े सम्बन्ध और अधिक बिगड़े। मैं अब अपना ध्यान इधर-उधर की और बातों में लगा नहीं सकता। मेरी परीक्षा आगामी सोमवार से आरम्भ होने वाली है।’’

इसपर शकुन्तला और ललिता वह पत्र लेकर घर आ गईं। दोनों ने कमरे का दरवाजा बन्द कर पत्र पढ़ा। उसमें लिखा था,

‘‘प्रिय बिहारी ! यह जानकर संतोष हुआ है कि ललिता, उसकी बहिन और उसकी माँ ने खाना-पीना आरम्भ कर दिया है, यह बात भी ठीक ही है कि सेठजी ने ललिता का विवाह, उसके वयस्क होने तक न करने का वचन दे दिया है। इसपर भी मैं समझता हूँ कि हमारा इस परिवार से सम्बन्ध किसी भाँति भी ठीक नहीं हो सकता मैं तुमको वह पूर्ण पृष्ठ-भूमि बता देना चाहता हूँ, जो इस सगाई तोड़ने का कारण बनी है। उसको जानकर तुम भी यही समझोगे कि इस का कारण बनी है। उसको जानकरतुम भी यही समझोगे कि इस सगाई के टूटने से ठीक ही हुआ है।

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