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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘लक्ष्मीधर ने पुलिस में बयान दिया है कि सेठजी ने उसको देवगढ़ भेजा था, तो कह दिया था कि केवल खर्चा चलाने के लिए ही रुपया फकीरचन्द को देना चाहिए। शेष रुपया सेठजी की सीधा भेज दिया जाये। इस कारण वह कुछ रुपया मुझे देता रहा था और शेष धन सीधा सेठ जी को भेज देता था। उसकी रसीदें उसके पास है। वह इस रुपये भेजने की सूचना मुझको दे देना चाहता था, परन्तु सेठजी ने उसको मना कर दिया था। जिस पत्र द्वारा सेठजी ने उसको मुझसे रुपये की बात चोरी रखने के लिए कहा था, वह पत्र उसने पुलिस को दिखाया है। उस पत्र में स्पष्ट लिखा है कि एक कारण-विशेष से वे नहीं चाहते कि मुझको यह पता कि कितनी आय उनको हो रही है। इस कारण मुझको केवल उन वैगनों का ही हिसाब लिखाया जाये, जिनका दाम मुझको देना हो। अन्य माल का हिसाब लिखाने की आवश्यकता नहीं।

‘‘इसपर भी जब मुझको सन्देह हुआ कि मोतीराम अथवा लक्ष्मीधर रुपया गबन कर गये हैं और मैंने इस विषय में सेठजी को लिखा, तो उन्होंने मुझको यह नहीं बताया कि वे कोई रुपया मेरे ज्ञान के बिना प्राप्त करते रहे हैं। केवल यही नहीं, प्रत्युक्त उन्होंने मेरे ऊपर यह आरोप लगाना आरम्भ कर दिया कि मैंने काम पर ध्यान नहीं दिया। पश्चात् उन्होंने यह लिखा कि मैंने जान-बूझकर चोरी होने दी है और अपने अन्तिम पत्र में तो उन्होंने यह बात स्पष्ट रूप से लिख दी थी कि रुपया मैंने गबन किया है और वे अपनी लड़की की सगाई मुझसे तोड़ते है।

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