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धर्म एवं दर्शन >> सूक्तियाँ एवं सुभाषित

सूक्तियाँ एवं सुभाषित

स्वामी विवेकानन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :95
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9602

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अत्यन्त सारगर्भित, उद्बोधक तथा स्कूर्तिदायक हैं एवं अन्यत्र न पाये जाने वाले अनेक मौलिक विचारों से परिपूर्ण होने के नाते ये 'सूक्तियाँ एवं सुभाषित, विवेकानन्द-साहित्य में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।


16. यह दुनिया एक व्यायामशाला है, जहाँ हम अपने आपको बलवान बनाने के लिए आते हैं।

17. जैसे तुम पौधे को उगा नहीं सकते, वैसे ही तुम बच्चे को सिखा नहीं सकते। जो कुछ तुम कर सकते हो वह केवल नकारात्मक पक्ष में है - तुम केवल सहायता दे सकते हो। वह तो एक आन्तरिक अभिव्यंजना है, वह अपना स्वभाव स्वयं विकसित करता है तुम केवल बाधाओं को दूर कर सकते हो।

18. एक पन्थ बनाते ही तुम विश्वबन्धुता के विरुद्ध हो जाते हो। जो सच्ची विश्वबन्धुता की भावना रखते हैं, वे अधिक बोलते नहीं उनके कर्म ही स्वयं जोर से बोलते हैं।

19. सत्य हजार ढंग से कहा जा सकता है, और फिर भी हर ढंग सच हो सकता है।

20. तुमको अन्दर से बाहर विकसित होना है। कोई तुमको न सिखा सकता है, न आध्यात्मिक बना सकता है। तुम्हारी आत्मा के सिवा और कोई गुरु नहीं है।

21. यदि एक अनन्त श्रृंखला में कुछ कड़ियाँ समझायी जा सकती हैं, तो उसी पद्धति से सब समझायी जा सकती हैं।

22. जो मनुष्य किसी भौतिक वस्तु से विचलित नहीं होता, उसने अमरता पा ली।

23. सत्य के लिए सब कुछ त्यागा जा सकता है, पर सत्य को किसी भी चीज के लिए छोड़ा नहीं जा सकता, उसकी बलि नहीं दी जा सकती।

24. सत्य का अन्वेषण शक्ति की अभिव्यक्ति है - वह कमजोर, अन्य लोगों का अँधेरे में टटोलना नही है।

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