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धर्म एवं दर्शन >> सूक्तियाँ एवं सुभाषित

सूक्तियाँ एवं सुभाषित

स्वामी विवेकानन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :95
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9602

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अत्यन्त सारगर्भित, उद्बोधक तथा स्कूर्तिदायक हैं एवं अन्यत्र न पाये जाने वाले अनेक मौलिक विचारों से परिपूर्ण होने के नाते ये 'सूक्तियाँ एवं सुभाषित, विवेकानन्द-साहित्य में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।


74. मनुष्य पशुता, मनुष्यता और देवत्व का मिश्रण है,

75. सामाजिक प्रगति शब्द का उतना ही अर्थ है, जितना 'गर्म बर्फ' या 'अँधेरा प्रकाश'। अन्ततः 'सामाजिक प्रगति' जैसी कोई चीज नहीं।

76. वस्तुएँ अधिक अच्छी नहीं बनती; हम उसमें परिवर्तन करके अधिक अच्छे बनते हैं।

77. मैं अपने साथियों की मदद कर सकूँ बस इतना ही मैं चाहता हूँ।

78. न्यूयार्क में एक प्रश्न के उत्तर में स्वामीजी ने धीरे से कहा ''नहीं, मै परलोक-विद्या में विश्वास नहीं करता। यदि कोई चीज सच नहीं है, तो नहीं है। अद्भुत या विचित्र चीज भी प्राकृतिक घटनाएँ हैं। मैं उन्हें विज्ञान की वस्तु मानता हूँ। तब वे मेरे लिए परलोक- विद्यावाली या भूत-प्रेतवाली नहीं होती। मैं ऐसी परलोकज्ञान-सस्थाओं में विश्वास नहीं करता। वे कुछ भी अच्छा नहीं करती, न वे कभी कुछ अच्छा कर सकती हैं।

79. मनुष्यों में साधारणतया चार प्रकार होते हैं - बुद्धिवादी, भावुक, रहस्यवादी, कर्मठ। हमें इनमें से प्रत्येक के लिए उचित प्रकार की पूजा-विधि देनी चाहिए।

बुद्धिवादी मनुष्य आता है और कहता है 'मुझे इस तरह का पूजा-विधान पसन्द नहीं, मुझे दार्शनिक विवेकसिद्ध सामग्री दो - वही मैं चाहता हूँ। 'अत: बुद्धिवादी मनुष्य के लिए बुद्धिसम्मत दार्शनिक पूजा है। फिर आता है कर्मठ। वह कहता है 'दार्शनिक की पूजा मेरे किसी काम की नहीं। मुझे अपने मानव बन्धुओं की सेवा का काम दो।' उसके लिए सेवा ही सब से बड़ी पूजा है। रहस्यवादी और भावुक के लिए उनके योग्य पूजा पद्धतियाँ हैं। धर्म में, इन सब लोगों के विश्वास के तत्त्व हैं।

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